Socio-Religious Reform Movements in India (सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन) – Complete Notes, PYQs & MCQs

Socio-Religious Reform Movements in India (सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन): 19वीं शताब्दी के दौरान भारत में एक अभूतपूर्व बौद्धिक, सांस्कृतिक और सामाजिक-धार्मिक पुनर्जागरण (Renaissance) का उदय हुआ। इसे “आधुनिक भारत का पुनर्जागरण” कहा जाता है।

ब्रिटिश शासन की स्थापना, पश्चिमी शिक्षा के प्रसार, ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों, और भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वासों, कुरीतियों तथा सामाजिक रूढ़ियों (जैसे सती प्रथा, जाति व्यवस्था, छुआछूत, मूर्ति पूजा) के उत्तर में भारतीय बुद्धिजीवियों ने अपने धर्म और समाज का आंतरिक पुनर्मूल्यांकन शुरू किया।

इन आंदोलनों को मुख्य रूप से दो धाराओं में विभाजित किया जाता है:

  1. सुधारवादी आंदोलन (Reformist Movements): जो पश्चिमी विचारों, बुद्धिवाद (Rationalism) और मानवीयता पर आधारित थे (उदा. ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, अलीगढ़ आंदोलन)।
  2. पुनरुत्थानवादी आंदोलन (Revivalist Movements): जो प्राचीन भारतीय संस्कृति और वेदों की ओर लौटने का आह्वान करते थे (उदा. आर्य समाज, देवबंद आंदोलन)।
  • बुद्धिवाद (Rationalism): किसी भी सामाजिक या धार्मिक प्रथा को केवल परंपरा के आधार पर स्वीकार करने के बजाय तर्क और विवेक की कसौटी पर कसना।
  • मानववाद (Humanism): मनुष्य की गरिमा, समानता और कल्याण को सर्वोपरि मानना।
  • सर्वधर्म समभाव (Universalism): सभी धर्मों के मूल सत्य को एक मानना और धार्मिक कट्टरता का विरोध करना।
  • उपाधियां: “भारतीय पुनर्जागरण के पिता”, “आधुनिक भारत के निर्माता”, “सुप्रभात का तारा” (Star of Dawn), “राष्ट्रवाद के पैगंबर”। (उन्हें ‘राजा’ की उपाधि मुगल सम्राट अकबर द्वितीय ने 1830 में दी थी)।
  • दर्शन: वे एकेश्वरवाद (Monotheism) के समर्थक थे और मूर्तिपूजा, बहुदेववाद, तथा पुरोहितवाद के विरोधी थे।
  • संस्थाएं:
    • 1814: आत्मीय सभा की स्थापना (कलकत्ता में एकेश्वरवादी विचारों के प्रसार हेतु)।
    • 1817: डेविट हरे के साथ मिलकर हिंदू कॉलेज (कलकत्ता) की स्थापना।
    • 1825: वेदांत कॉलेज की स्थापना।
    • 20 अगस्त 1828: ब्रह्म सभा की स्थापना (जो बाद में ब्रह्म समाज बनी)।
  • समाचार पत्र एवं पुस्तकें:
    • तुहफत-उल-मुवाहिद्दीन (Tuhfat-ul-Muwahhidin – 1809, फारसी में – ‘एकेश्वरवादियों को उपहार’)।
    • संवाद कौमुदी (1821, बंगाली में)।
    • मिरात-उल-अखबार (1822, फारसी में – भारत का पहला फारसी अखबार)।
    • Precepts of Jesus (1820)।
  • प्रमुख योगदान:
    • उनके अथक प्रयासों से लॉर्ड विलियम बैंटिंक ने सती प्रथा निषेध अधिनियम (1829 का नियम XVII) पारित किया।
    • 1833 में ब्रिस्टल (इंग्लैंड) में उनका निधन हुआ।

Raja Ram Mohan Roy की 1833 में ब्रिस्टल में मृत्यु के पश्चात ब्रह्म समाज की गतिविधियां सुस्त पड़ गईं। इसे पुनः पुनर्जीवित करने और आगे चलकर विभाजित होने का क्रम निम्नलिखित है:

A. महर्षि देवेंद्रनाथ टैगोर (1817–1905) का योगदान:

  • 1839: इन्होंने तत्वबोधिनी सभा की स्थापना की (जिसका उद्देश्य वेदांत विचारों और भारतीय संस्कृति का प्रचार करना था)।
  • 1843: इन्होंने तत्वबोधिनी पत्रिका (बंगाली में) का प्रकाशन शुरू किया।
  • 1842: देवेंद्रनाथ टैगोर औपचारिक रूप से ब्रह्म समाज में शामिल हुए और इसे संगठित रूप दिया। इन्होंने ‘ब्रह्म उपासना’ की एक नई पद्धति तैयार की।

B. केशव चंद्र सेन (1838–1884) का प्रवेश एवं प्रसार:

  • 1857: केशव चंद्र सेन ब्रह्म समाज से जुड़े। देवेंद्रनाथ टैगोर ने इन्हें 1862 में ‘आचार्य’ की उपाधि दी।
  • बंगाल से बाहर प्रसार: केशव चंद्र सेन के ओजस्वी भाषणों और प्रयासों से ब्रह्म समाज की शाखाएं बंगाल से बाहर बॉम्बे, मद्रास, उत्तर प्रदेश और पंजाब तक फैलीं (इन्हीं की प्रेरणा से बॉम्बे में प्रार्थना समाज और मद्रास में वेद समाज की स्थापना हुई)।
  • कट्टरपंथी/उदारवादी विचार: इन्होंने ईसाई और इस्लामिक ग्रंथों के अंशों को भी प्रार्थना में शामिल करना शुरू किया, गैर-ब्राह्मणों को उपदेश देने का अधिकार दिया और अंतर-जातीय विवाहों (Inter-caste marriages) का पुरजोर समर्थन किया।

C. प्रथम विभाजन – 1866 (First Schism):

  • विवाद का कारण: देवेंद्रनाथ टैगोर ब्रह्म समाज को केवल हिंदू धर्म के आंतरिक सुधारों तक सीमित रखना चाहते थे और उपनिषदों को सर्वोपरि मानते थे, जबकि केशव चंद्र सेन इसे सर्वधर्म समभाव और अधिक कट्टरपंथी (Radical) सामाजिक सुधारों की ओर ले जाना चाहते थे।
  • विभाजन: 1865 में देवेंद्रनाथ ने केशव चंद्र सेन को आचार्य पद से बर्खास्त कर दिया।
    1. आदि ब्रह्म समाज (1866): महर्षि देवेंद्रनाथ टैगोर का गुट (जो पारंपरिक और हिंदू धर्म-केंद्रित रहा)।
    2. भारतीय ब्रह्म समाज / Brahmo Samaj of India (1866): केशव चंद्र सेन का नया गुट (जो अधिक उदारवादी और सर्वधर्म-आधारित था)।

D. नेटिव मैरिज एक्ट 1872 (Native Marriage Act 1872):

  • केशव चंद्र सेन के सामाजिक सुधार प्रयासों के कारण 1872 में ब्रिटिश सरकार ने सिविल मैरिज एक्ट / नेटिव मैरिज एक्ट 1872 पारित किया।
  • इसके तहत बहुविवाह को अवैध घोषित किया गया और लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु 14 वर्ष तथा लड़कों की 18 वर्ष तय की गई।

E. द्वितीय विभाजन – 1878 (Second Schism):

  • विवाद का कारण: 1878 में केशव चंद्र सेन ने स्वयं के बनाए 1872 के कानून का उल्लंघन करते हुए अपनी 13 वर्ष की अल्पवयस्क पुत्री का विवाह कूचबिहार (Coch Behar) के राजा के साथ पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाजों और मूर्तिपूजा के साथ कर दिया।
  • विभाजन: केशव चंद्र सेन के इस दोहरे चरित्र और अंधविश्वास के समर्थन से उनके युवा अनुयायी सख्त नाराज हुए।
    • साधारण ब्रह्म समाज (1878): आनंद मोहन बोस, शिवनाथ शास्त्री, उमेश चंद्र दत्ता और विपिन चंद्र पाल ने मिलकर 15 मई 1878 को ‘साधारण ब्रह्म समाज’ की स्थापना की।
    • सिद्धान्त: यह गुट लोकतांत्रिक सिद्धांतों, मूर्तिपूजा के पूर्ण बहिष्कार और महिलाओं के अधिकारों पर आधारित था।

1. स्थापना एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • स्थापना की तिथि एवं स्थान: 31 मार्च 1867 को बॉम्बे (महाराष्ट्र) में।
  • मुख्य संस्थापक: डॉ. आत्माराम पांडुरंग (Dr. Atmaram Pandurang)।
  • मुख्य प्रेरणास्रोत: केशव चंद्र सेन (Keshub Chandra Sen), जब वे 1864 और 1867 में बॉम्बे की यात्रा पर आए थे। उनके ओजस्वी विचारों से प्रभावित होकर ही बॉम्बे के बुद्धिजीवियों ने ‘परमहंस मंडली’ के बिखरने के बाद ‘प्रार्थना समाज’ का गठन किया।
  • भक्ति परंपरा से जुड़ाव: ब्रह्म समाज के विपरीत (जो उपनिषदों पर आधारित था), प्रार्थना समाज का वैचारिक आधार महाराष्ट्र की पारंपरिक वारकरी भक्ति परंपरा (संत तुकाराम, संत ज्ञानेश्वर, संत नामदेव और संत एकनाथ के उपदेशों) से गहराई से जुड़ा हुआ था।
  • एकेश्वरवाद (Monotheism): यह केवल एक निराकार ईश्वर की पूजा पर बल देता था और मूर्तिपूजा, पुरोहितवाद तथा निरर्थक कर्मकांडों का विरोध करता था।
  • उदारवादी व क्रमिक सुधार (Cautious Reform): प्रार्थना समाज ने समाज या हिंदू धर्म से सीधे टकराव (Radical Revolt) का रास्ता नहीं अपनाया। इनका मानना था कि समाज में अचानक उग्र परिवर्तन लाने के बजाय धीरे-धीरे, शिक्षा और सर्व-सहमति से सुधार किए जाने चाहिए। (इसीलिए इसके सदस्य हिंदू समाज से अलग नहीं हुए, बल्कि उसके भीतर रहकर ही सुधार करते रहे)।
A. महादेव गोविंद रानाडे (M.G. Ranade – 1842–1901)
  • प्रवेश: 1870 में प्रार्थना समाज से जुड़े और इसके सबसे मुख्य विचारक व नेता बने।
  • उपाधि: इन्हें “महाराष्ट्र का सुकरात” (Socrates of Maharashtra) कहा जाता है।
  • प्रमुख संस्थाएं:
    • पुणे सार्वजनिक सभा (1870): गणेश वासुदेव जोशी (सार्वजनिक काका) और एस.एच. चिपलूणकर के साथ मिलकर राजनीतिक व सामाजिक चेतना जगाने हेतु स्थापना की।
    • भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन (Indian National Social Conference – 1887):
      • इन्होंने रघुनाथ राव के साथ मिलकर 1887 में इसकी स्थापना की। इसे “भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का सामाजिक विंग” कहा जाता था, जिसकी बैठकें प्रतिवर्ष कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन के तुरंत बाद उसी पंडाल में होती थीं।
      • ‘प्रतिज्ञा आंदोलन’ (Pledge Movement): इस सम्मेलन के तहत बाल विवाह को रोकने के लिए ‘प्रतिज्ञा आंदोलन’ चलाया गया, जिसमें लोगों से अपने बच्चों का बाल विवाह न करने का संकल्प पत्र भरवाया जाता था।
    • डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी (1884): जी.जी. आगरकर और बाल गंगाधर तिलक के साथ मिलकर पुणे में स्थापना की, जिसके तहत 1885 में फ़र्ग्यूसन कॉलेज (Fergusson College) खुला।
    • विधवा पुनर्विवाह संघ (Widow Remarriage Association – 1861): विष्णु शास्त्री पंडित के साथ मिलकर स्थापना की।
B. डॉ. आर.जी. भंडारकर (Ramkrishna Gopal Bhandarkar)
  • भारत के प्रसिद्ध प्राच्यविद (Indologist) और इतिहासकार, जिन्होंने प्रार्थना समाज के धार्मिक सिद्धांतों को दार्शनिक आधार दिया। इन्होंने संस्कृत साहित्य और प्राचीन शास्त्रों के प्रमाण प्रस्तुत करके साबित किया कि जाति प्रथा और छुआछूत का मूल वैदिक धर्म में कोई स्थान नहीं है।
C. सर नारायण गणेश चंदावरकर (N.G. Chandavarkar)
  • रानाडे के बाद प्रार्थना समाज के मुख्य नेता बने। ये बंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1900 (लाहौर अधिवेशन) के अध्यक्ष भी रहे।

प्रार्थना समाज का पूरा ध्यान मुख्य रूप से 4 सामाजिक सुधारों पर केंद्रित था:

  1. जाति प्रथा का विरोध एवं उन्मूलन (Disapproval of Caste System)।
  2. स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देना (Promoting Female Education)।
  3. विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहन (Encouraging Widow Remarriage)।
  4. विवाह की आयु में वृद्धि / बाल विवाह पर रोक (Raising Age of Marriage for both Boys and Girls)।
  • दलित एवं महिला उत्थान: इन्होंने अनाथों, विधवाओं और गरीब बच्चों के लिए रात्रि विद्यालय (Night Schools), शिशु गृह और अनाथालय खोले।
  • पंढरपुर अनाथालय (1875): पंढरपुर में बेसहारा बच्चों और विधवाओं के लिए एक विशाल आश्रम और अनाथालय की स्थापना की।
  • मूल नाम: स्वामी दयानंद का वास्तविक/मूल नाम मूलशंकर था। इनका जन्म 1824 में टंकारा (काठियावाड़, गुजरात) के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
  • सत्य की खोज एवं गुरु: 21 वर्ष की आयु में इन्होंने गृहत्याग किया। 1860 में मथुरा में इनकी मुलाकात अंध प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानंद सरस्वती से हुई, जिन्हें इन्होंने अपना गुरु बनाया। विरजानंद जी ने ही इन्हें आर्ष ग्रंथों (वेदों) के प्रचार-प्रसार का संकल्प दिलाया।
  • प्रसिद्ध नारे एवं उद्घोष:
    • “वेदों की ओर लौटो” (Back to the Vedas): इसका अर्थ वैदिक काल की सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था को पुनः स्थापित करना था, न कि अंधानुकरण।
    • “भारत भारतीयों के लिए है” (India for Indians): स्वामी दयानंद पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने ‘स्वराज्य’ शब्द का प्रयोग किया और हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करने का बल दिया। (एनी बेसेंट ने कहा था: “स्वामी दयानंद ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत भारतीयों के लिए है।’ )
  • स्थापना: 10 अप्रैल 1875 को बॉम्बे (काकरवाड़ी) में स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा आर्य समाज की स्थापना की गई।
  • मुख्यालय का स्थानांतरण: 1877 में आर्य समाज का मुख्य मुख्यालय लाहौर (पंजाब) स्थानांतरित कर दिया गया, जिसके बाद पंजाब और उत्तर भारत में इसका व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ।
  • सत्यार्थ प्रकाश (1875): यह आर्य समाज का मूल प्रामाणिक ग्रंथ है, जिसे स्वामी दयानंद जी ने हिंदी भाषा (बनारस में रहकर) में लिखा था।
  • पाखंड खंडिनी पताका (1863): आगरा में ढोंग, अंधविश्वास और झूठे धार्मिक आडंबरों के खंडन हेतु यह पताका फहराई गई।
  • अन्य प्रमुख रचनाएं: वेद भाष्य भूमिका, ऋग्वेद भाष्य, अद्वैतमत का खंडन, और पंचमहायज्ञ विधि

1877 में लाहौर मुख्यालय में आर्य समाज के 10 नियम/सिद्धांत निर्धारित किए गए, जो निम्नलिखित हैं:

  1. ईश्वर ही सब सत्य विद्याओं का मूल है: सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उन सब का आदिमूल परमेश्वर है।
  2. ईश्वर का स्वरूप: ईश्वर सच्चिदानंदस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है, उसी की उपासना करनी योग्य है।
  3. वेदों की परम प्रामाणिकता: वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक है। वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है। (वेदों को ‘अपौरुषेय’ और ‘अंतिम सत्य/Infallible’ माना गया)।
  4. सत्य का ग्रहण: सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए।
  5. धर्मानुसार आचरण: सब काम धर्मानुसार अर्थात सत्य और असत्य का विचार करके करने चाहिए।
  6. संसार का उपकार: संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।
  7. प्रीतिपूर्वक व्यवहार: सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य वर्तना (व्यवहार करना) चाहिए।
  8. अविद्या का नाश: अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिए।
  9. व्यक्तिगत स्वातंत्र्य एवं सामाजिक हित: प्रत्येक को अपनी ही उन्नति में संतुष्ट न रहना चाहिए, किंतु सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए।
  10. सामाजिक सर्वहितकारी नियम: सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने में परतंत्र रहना चाहिए और प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतंत्र रहें।
  • धार्मिक एवं सामाजिक कुरीतियों का खंडन: इन्होंने बाल विवाह, बहुविवाह, सती प्रथा, पर्दा प्रथा, जाति प्रथा, छुआछूत, मूर्तिपूजा, बलि प्रथा, और अवतारवाद/पुरोहितवाद का सख्त विरोध किया।
  • जन्म आधारित नहीं, कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था: दयानंद सरस्वती ने स्पष्ट किया कि जन्म के आधार पर कोई ब्राह्मण या शूद्र नहीं होता, बल्कि व्यक्ति का गुण, कर्म और स्वभाव उसका वर्ण तय करता है।
  • शुद्धि आंदोलन (Shuddhi Movement): जिन हिंदुओं को दबाव, लालच या भय से ईसाई या इस्लाम धर्म में परिवर्तित कर दिया गया था, उन्हें पुनः हिंदू धर्म में लाने के लिए ‘शुद्धि आंदोलन’ चलाया गया।
  • गौरक्षिणी सभा (1882): गायों की रक्षा हेतु 1882 में ‘गौरक्षिणी सभा’ का गठन किया गया और गोकरुणानिधि नामक पुस्तक लिखी।

1883 में स्वामी दयानंद की मृत्यु के पश्चात 1893 में शिक्षा के स्वरूप और खान-पान (मांसाहार/शाकाहार) के मुद्दे पर आर्य समाज दो गुटों में विभाजित हो गया:

विभाजन का आधारपाश्चात्य शिक्षा समर्थक गुट (Modern / Anglo Faction)पारंपरिक शिक्षा समर्थक गुट (Gurukul Faction)
प्रमुख नेता (Leaders)लाला लाजपत राय, लाला हंसराजस्वामी श्रद्धानन्द (मुंशीराम), पंडित लेखराम
शिक्षा का माध्यम (Medium)अंग्रेजी एवं पाश्चात्य विज्ञान + वैदिक साहित्यकेवल संस्कृत एवं वैदिक परंपरा
स्थापित संस्थाएं (Institutions)DAV (दयानंद एंग्लो-वैदिक) कॉलेज, लाहौर (1886 में लाला हंसराज द्वारा स्थापित)।गुरुकुल कांगड़ी, हरिद्वार (1902 में स्वामी श्रद्धानन्द द्वारा स्थापित)।
खान-पान सम्बंधी विचारभोजन व्यक्तिगत पसंद है (मांसाहार का कड़ा विरोध नहीं)।पूर्णतः शाकाहार का समर्थन।
  • मूल नाम एवं स्थान: इनका वास्तविक नाम गदाधर चट्टोपाध्याय था। ये कलकत्ता के पास हुगली जिले के कामारपुकुर गांव के एक गरीब ब्राह्मण परिवार से थे और दक्षिणेश्वर काली मंदिर के मुख्य पुजारी थे।
  • मूल दर्शन (Core Philosophy):
    • “जीव ही शिव है” (Service to Man is Service to God): इनका मानना था कि मानव सेवा ही ईश्वर की सच्ची पूजा है।
    • सभी धर्मों की मौलिक एकता (Yato Mat, Tato Path): “जितने मत, उतने पथ” — अर्थात सभी धर्म एक ही ईश्वर तक पहुंचने के अलग-अलग मार्ग हैं। इन्होंने हिंदू धर्म के अलावा इस्लाम और ईसाई धर्म की भी साधना की और निष्कर्ष निकाला कि सभी का अंतिम सत्य एक ही है।
    • सर्वधर्म समभाव: इन्होंने धार्मिक आडंबरों और केवल ज्ञान मार्ग के स्थान पर भक्ति, निष्काम कर्म और सेवा भाव पर बल दिया।
  • मूल नाम एवं प्रारंभिक जीवन: स्वामी विवेकानंद का मूल नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। इनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता के एक संभ्रांत परिवार में हुआ था।
  • ‘विवेकानंद’ नामकरण: 1893 में अमेरिका (शिकागो) जाने से ठीक पहले खेतड़ी (राजस्थान) के राजा अजीत सिंह के सुझाव पर इन्होंने अपना नाम बदलकर ‘स्वामी विवेकानंद’ रखा।
  • व्यावहारिक वेदांत (Practical / Neo-Vedanta):
    • इन्होंने शंकाराचार्य के ‘अद्वैत वेदांत’ को व्यावहारिक रूप दिया। इन्होंने कहा कि वेदांत केवल जंगलों या गुफाओं में चिंतन करने के लिए नहीं है, बल्कि इसे आम आदमी के दैनिक जीवन और समाज सेवा में लागू होना चाहिए।
    • इन्होंने कहा: “जब तक लाखों लोग भूखे और अज्ञानी हैं, तब तक मैं उस हर व्यक्ति को देशद्रोही मानता हूं जो उनके खर्चे पर शिक्षित हुआ है लेकिन उनकी परवाह नहीं करता।”
    • इन्होंने “दरिद्र नारायण” (गरीबों में ईश्वर का रूप) की सेवा पर सबसे ज्यादा जोर दिया।
  • शिकागो विश्व धर्म संसद (11 सितंबर 1893):
    • अमेरिका के शिकागो शहर में आयोजित ‘प्रथम विश्व धर्म संसद’ (Parliament of the World’s Religions) में इन्होंने भारत और हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया।
    • इन्होंने अपने संबोधन की शुरुआत “Sisters and Brothers of America” (मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों) से की, जिससे पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा।
    • इन्होंने विश्व को भारत के सहिष्णुता (Tolerance) और सार्वभौमिक स्वीकार्यता (Universal Acceptance) के संदेश से परिचित कराया।
  • पेरिस धर्म महासभा (1900): शिकागो के बाद 1900 में फ्रांस की राजधानी पेरिस में आयोजित ‘इतिहास और धर्मों की कांग्रेस’ में भी इन्होंने भाग लिया और वेदों तथा लिंगायत संप्रदाय पर शोध पत्र प्रस्तुत किए।
  • रामकृष्ण मठ (1886): रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु (1886) के तुरंत बाद विवेकानंद ने अपने गुरुभाइयों के साथ मिलकर संन्यासियों के आध्यात्मिक प्रशिक्षण हेतु बराहनगर (कलकत्ता) में पहला मठ स्थापित किया, जिसे बाद में बेलूर स्थानांतरित किया गया।
  • रामकृष्ण मिशन (1 मई 1897):
    • स्थापना: 1 मई 1897 को कलकत्ता के बेलूर (हावड़ा) में ‘रामकृष्ण मिशन’ की औपचारिक स्थापना की गई।
    • प्रकृति एवं उद्देश्य: रामकृष्ण मठ जहां संन्यासियों का आध्यात्मिक केंद्र था, वहीं रामकृष्ण मिशन एक गैर-धार्मिक, समाज सेवी संगठन (Charitable Society) बना। इसका मुख्य उद्देश्य अकाल, महामारी, बाढ़ जैसी आपदाओं में राहत कार्य चलाना, अस्पताल खोलना, और शिक्षा का प्रसार करना था।
  • प्रसिद्ध पुस्तकें (Books):
    • राजयोग (Raja Yoga)
    • कर्मयोग (Karma Yoga)
    • भक्तियोग (Bhakti Yoga)
    • ज्ञानयोग (Jnana Yoga)
    • वर्तमान भारत (Bartaman Bharat – बंगाली भाषा में लिखित)
    • प्राच्य और पाश्चात्य (East and West)
  • समाचार पत्र एवं पत्रिकायें:
    • प्रबुद्ध भारत (Prabuddha Bharata): 1896 से प्रकाशित अंग्रेजी भाषा की मासिक पत्रिका।
    • उद्बोधन (Udbodhan): 1899 से प्रकाशित बंगाली भाषा की पत्रिका।
  • प्रमुख विदेशी शिष्या – सिस्टर निवेदिता:
    • आयरलैंड की मूल निवासी मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल (Margaret Elizabeth Noble) इनकी मुख्य शिष्या बनीं, जिन्हें विवेकानंद ने ‘सिस्टर निवेदिता’ (भगिनी निवेदिता) नाम दिया। इन्होंने भारत में बालिकाओं की शिक्षा और स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • प्रसिद्ध नारा: “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।” (Arise, awake, and stop not till the goal is reached).
  • सुभाष चंद्र बोस का कथन: नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने विवेकानंद के बारे में लिखा: “जहाँ तक बंगाल का संबंध है, हम विवेकानंद को आधुनिक राष्ट्रीय आंदोलन का आध्यात्मिक पिता (Spiritual Father of the Modern National Movement) कह सकते हैं।”
  • राष्ट्रीय युवा दिवस: भारत सरकार द्वारा 1985 से स्वामी विवेकानंद के जन्म दिवस (12 जनवरी) को प्रतिवर्ष ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ (National Youth Day) के रूप में मनाया जाता है।
  • जन्म एवं पृष्ठभूमि: इनका जन्म 1827 में सतारा (महाराष्ट्र) के एक माली (शूद्र) परिवार में हुआ था। इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मिशनरी स्कूल से पूरी की।
  • ‘महात्मा’ की उपाधि: 11 मई 1888 को बॉम्बे के एक विशाल जनसमूह द्वारा मुंबई के सामाजिक कार्यकर्ता विट्ठलराव वंडेकर द्वारा इन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि दी गई।
  • स्थापना की तिथि एवं स्थान: 24 सितंबर 1873 को पुणे (महाराष्ट्र) में ज्योतिबा फुले द्वारा सत्यशोधक समाज (Truth-Seekers’ Society) की स्थापना की गई।
  • मूल उद्देश्य:
    • उच्च जातीय ब्राह्मणवादी वर्चस्व, पुरोहितवाद और धार्मिक आडंबरों का पूर्ण खंडन।
    • वंचितों, दलितों (शूद्रों व अति-शूद्रों) और महिलाओं को उनके सामाजिक, धार्मिक व नागरिक अधिकारों के प्रति जागरूक करना।
    • विवाह व अन्य सामाजिक संस्कारों से ब्राह्मण पुरोहितों की मध्यस्थता को पूरी तरह समाप्त करना और मराठी में सरल प्रार्थनाएं करवाना।
  • संगठन की संरचना: इसमें किसी भी जाति, धर्म या लिंग का व्यक्ति सदस्य बन सकता था। इसके पहले अध्यक्ष स्वयं ज्योतिबा फुले और सचिव गोविंदराव कड़ोलकर बने।
  • गुलामगिरी (Gulamgiri – 1873): यह ज्योतिबा फुले की सबसे प्रसिद्ध मराठी पुस्तक है। इन्होंने इस पुस्तक को अमरीका के उन नागरिकों को समर्पित किया जिन्होंने दासों को मुक्त कराने के लिए गृहयुद्ध लड़ा था।
  • सार्वजनिक सत्यधर्म (Sarvajanik Satya Dharma): यह पुस्तक ज्योतिबा फुले की मृत्यु (1890) के बाद 1891 में प्रकाशित हुई, जिसे सत्यशोधक समाज की ‘धर्मपुस्तक’ माना जाता है।
  • अन्य रचनाएं: तृतीय रत्न (1855 – नाटक), छत्रपति शिवाजी राजे भोंसले यांचा पोवाड़ा (1869), ब्राह्मणंचे कसब (1869 – ब्राह्मणों की चालाकी), शेतकऱ्याचा असूड (1883 – किसान का कोड़ा)।
  • दीनबंधु (Deenbandhu): 1877 में कृष्णराव भालेकर द्वारा शुरू किया गया मराठी साप्ताहिक पत्र, जो सत्यशोधक समाज का मुख्य पत्र बना।
  • भारत का पहला बालिका विद्यालय (1848): ज्योतिबा फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले ने मिलकर 1848 में पुणे के भिड़े वाड़ा में भारत का पहला लड़कियों का स्कूल खोला।
  • सावित्रीबाई फुले का योगदान: सावित्रीबाई फुले भारत की प्रथम महिला शिक्षिका (First Female Teacher) बनीं। इन्होंने समाज के कड़े विरोध और गोबर/कीचड़ फेंके जाने के बावजूद बालिकाओं को पढ़ाया।
  • बाल हत्या प्रतिबंधक गृह (1863): गर्भवती विधवाओं को आत्महत्या से बचाने और उनके अवैध बच्चों के सुरक्षित प्रसव हेतु अपने घर में ही केंद्र खोला। इन्होंने एक विधवा के बच्चे (यशवंत) को गोद लिया और उसे डॉक्टर बनाया।
  • स्थापना: 17 नवंबर 1875 को न्यूयॉर्क (अमेरिका) में मैडम हेलेना पेट्रोव्ना ब्लावात्स्की (रूस की आध्यात्मिक महिला) और कर्नल हेनरी स्टील ओलकाॅट (अमेरिकी सेनाधिकारी) द्वारा।
  • नाम का अर्थ: ‘थियोसोफी’ (Theosophy) ग्रीक शब्द ‘Theos’ (ईश्वर) और ‘Sophia’ (ज्ञान) से बना है, जिसका अर्थ है “ब्रह्मविद्या” या “ईश्वरीय ज्ञान”
  • मूल सिद्धांत:
    • यह आंदोलन प्राचीन हिंदू, बौद्ध और पारसी दर्शन से गहराई से प्रभावित था।
    • इसका मानना था कि उपनिषद, सांख्य, योग और वेदांत दर्शन में मानव जाति के परम सत्य निहित हैं।
    • पुनर्जन्म और कर्म के सिद्धांत में पूर्ण विश्वास।
  • भारत आगमन: ब्लावात्स्की और ओलकाॅट 1879 में भारत (बॉम्बे) आए।
  • अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय (1882): 1882 में मद्रास (चेन्नई) के पास अडयार (Adyar) में थियोसोफिकल सोसाइटी का स्थायी अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय स्थापित किया गया, जो आगे चलकर इसके विचारों का मुख्य केंद्र बना।
  • भारत आगमन: एनी बेसेंट 16 नवंबर 1893 को भारत आईं।
  • अध्यक्षता: 1907 में कर्नल ओलकाॅट की मृत्यु के पश्चात एनी बेसेंट थियोसोफिकल सोसाइटी की अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्षा बनीं।
  • सेंट्रल हिंदू कॉलेज, बनारस (1898):
    • इन्होंने 1898 में बनारस में सेंट्रल हिंदू कॉलेज (Central Hindu College) की स्थापना की, जहाँ हिंदू धर्म और आधुनिक पाश्चात्य विज्ञान दोनों की शिक्षा दी जाती थी।
    • 1916 में मदन मोहन मालवीय के अथक प्रयासों से यही कॉलेज विकसित होकर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) बना।
  • होम रूल लीग (1916): इन्होंने सितंबर 1916 में मद्रास में ‘ऑल इंडिया होम रूल लीग’ की स्थापना की।
  • कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष (1917): 1917 के कलकत्ता अधिवेशन में एनी बेसेंट भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनीं।
  • समाचार पत्र: न्यू इंडिया (New India) और कॉमनवील (Commonweal)।
  • संस्थापक एवं पृष्ठभूमि: हेनरी विवियन डेरोजियो (Henry Vivian Derozio), जो कलकत्ता के हिंदू कॉलेज में इतिहास और साहित्य के युवा प्रोफेसर (1826-1831) थे। ये मूलतः एंग्लो-इंडियन थे।
  • उपाधि: इन्हें “आधुनिक भारत का प्रथम राष्ट्रीय कवि” (First Nationalist Poet of Modern India) कहा जाता है।
  • मूल दर्शन एवं विचारधारा:
    • यह आंदोलन फ्रांसीसी क्रांति (1789) के आदर्शों—स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व (Liberty, Equality, Fraternity) से गहराई से प्रभावित था।
    • डेरोजियो ने अपने छात्रों को हर परंपरा पर प्रश्न उठाने, अंधविश्वासों का विरोध करने, और बुद्धिवाद (Rationalism) को अपनाने के लिए प्रेरित किया।
    • इन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता, महिलाओं की शिक्षा, और भारतीय जमींदारों द्वारा किसानों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाई।
  • संस्थाएं एवं समाचार पत्र:
    • एकेडेमिक एसोसिएशन (Academic Association – 1828): छात्रों में स्वतंत्र चिंतन और वाद-विवाद को बढ़ावा देने हेतु स्थापित।
    • सोसाइटी फॉर द एक्विजिशन ऑफ जनरल नॉलेज (1838): ज्ञान प्रसार हेतु।
    • समाचार पत्र/पत्रिकाएं: हेंसपेरस (Hesperus), द कलकत्ता क्रॉनिकल (The Calcutta Chronicle), द इंक्वायरर (The Enquirer), और एंलो-इंडियन (Anglo-Indian)।
  • असामयिक अंत एवं मूल्यांकन: 1831 में अत्यधिक उग्रवादी (Radical) विचारों के कारण इन्हें हिंदू कॉलेज से निकाल दिया गया और मात्र 22 वर्ष की आयु में हैजा (Cholera) से इनकी मृत्यु हो गई। सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने इनके बारे में लिखा था: “यंग बंगाल आंदोलन हमारी सभ्यता का अग्रदूत था और इसके नेता आधुनिक बंगाल के पिता थे।”
  • स्थान एवं संस्थापक: 1830 में कलकत्ता में राधाकांत देव (Radhakanta Deb) द्वारा।
  • प्रकृति एवं पृष्ठभूमि: यह एक रूढ़िवादी (Orthodox / Conservative) संगठन था, जिसका गठन राजा राममोहन राय के ‘ब्रह्म समाज’ के विचारों और सुधारों का मुकाबला करने के लिए किया गया था।
  • मुख्य उद्देश्य एवं कार्य:
    • सनातन हिंदू परंपराओं, मूर्तिपूजा, और जाति व्यवस्था की रक्षा करना।
    • इन्होंने 1829 के सती प्रथा निषेध कानून का पुरजोर विरोध किया और सती प्रथा के समर्थन में ब्रिटिश सरकार को याचिका (Petition) तक भेजी।
    • विरोधाभास (Nuance): सती प्रथा का समर्थन करने और धार्मिक रूप से रूढ़िवादी होने के बावजूद, धर्म सभा ने पश्चिमी शिक्षा और बालिकाओं की शिक्षा का समर्थन किया था।
  • पत्र-पत्रिका: समाचार चंद्रिका (Samachar Chandrika) – ब्रह्म समाज के ‘संवाद कौमुदी’ का मुकाबला करने हेतु निकाला गया पत्र।
  • स्थापना की तिथि एवं स्थान: 22 जून 1844 को सूरत (गुजरात) में।
  • संस्थापक: दुर्गाराम मंचाराम (Durgaram Manchharam Mehta), दादोबा पांडुरंग तर्खडकर, और नर्मादाशंकर।
  • मूल सिद्धांत एवं उद्देश्य:
    • ईश्वर एक है (एकेश्वरवाद) और संपूर्ण मानव जाति एक ही ईश्वर की संतान है।
    • धर्म का आधार बाह्य आडंबर या जाति व्यवस्था नहीं, बल्कि मानव का नैतिक आचरण होना चाहिए।
    • इन्होंने जादू-टोना, अंधविश्वास, और जातियों के भेदभाव के खिलाफ अभियान चलाया। इन्होंने चुनौती दी थी कि जो कोई भी भूत-प्रेत या जादू-टोना साबित कर देगा, उसे इनाम दिया जाएगा।
  • स्थान एवं संस्थापक: 1849 में बॉम्बे (महाराष्ट्र) में दादोबा पांडुरंग तर्खडकर, आत्माराम पांडुरंग, और दुर्गाराम मंचाराम द्वारा।
  • गुप्त संगठन (Secret Society): यह एक गुप्त संगठन था। इसके सदस्य अपनी पहचान छुपाकर रखते थे ताकि उच्च जातीय समाज के आक्रोश से बच सकें।
  • मुख्य उद्देश्य एवं गुप्त अनुष्ठान:
    • इसका मुख्य लक्ष्य जाति प्रथा और छुआछूत का पूर्ण उन्मूलन था।
    • दीक्षा अनुष्ठान: इनकी बैठकों में गुप्त रूप से निम्न जाति के रसोइये द्वारा पकाया गया भोजन और पानी सभी सदस्यों (उच्च जाति के लोगों सहित) को ग्रहण करना पड़ता था ताकि जाति के बंधन टूट सकें।
    • ये केवल एक ईश्वर की पूजा करते थे और विधवा पुनर्विवाह का समर्थन करते थे।
  • पतन: 1860 में किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा इस गुप्त सभा के सदस्यों की सूची सार्वजनिक कर दी गई, जिसके डर से यह मंडली समाप्त हो गई।
  • संस्थापक: प्रसिद्ध पारसी समाज सुधारक बेहरामजी एम. मालाबारी (B.M. Malabari) और दयाराम गिदुमल द्वारा।
  • मुख्य उद्देश्य:
    • सभी जातियों की अनाथ, बेसहारा और शोषित महिलाओं के पुनर्वास, शिक्षा और चिकित्सा देखभाल हेतु।
    • बाल विवाह का उन्मूलन और विधवाओं को आत्मनिर्भर बनाना।
  • मालाबारी का ऐतिहासिक योगदान (Age of Consent Act 1891):
    • बी.एम. मालाबारी के अथक पत्रकारीय और सामाजिक प्रयासों के परिणामस्वरूप ही ब्रिटिश सरकार ने सम्मति आयु अधिनियम 1891 (Age of Consent Act) पारित किया।
    • इसके तहत लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु 10 वर्ष से बढ़ाकर 12 वर्ष कर दी गई। (बाल गंगाधर तिलक ने इस कानून का विरोध किया था क्योंकि वे इसे भारतीय मामलों में ब्रिटिश सरकार का हस्तक्षेप मानते थे)।
  • स्थापना की तिथि एवं स्थान: 16 फरवरी 1887 को लाहौर में पंडित शिव नारायण अग्निहोत्री द्वारा।
  • संस्थापक का इतिहास: शिव नारायण अग्निहोत्री पहले ब्रह्म समाज के अनुयायी थे, लेकिन बाद में अलग होकर इन्होंने ‘देव समाज’ बनाया।
  • धार्मिक ग्रंथ: ‘देव शास्त्र’ (Dev Shastra) – यह इस समाज की मुख्य धर्मपुस्तक है।
  • विचारधारा का विकास:
    • शुरुआत में यह समाज एकेश्वरवाद और आत्मा की शुद्धि पर बल देता था।
    • लेकिन बाद में अग्निहोत्री ने ‘देव शास्त्र’ के माध्यम से ईश्वर के अस्तित्व को ही नकार दिया (नास्तिकता/Atheism) और स्वयं को ‘देव आत्मा’ घोषित कर दिया।
    • इसमें गुरु की पूजा (गुरु पूजा), उच्च नैतिक आचरण, मांस-मदिरा के पूर्ण बहिष्कार, और रिश्वतखोरी/चोरी के त्याग पर अत्यधिक बल दिया गया।
  • स्थान एवं संस्थापक: 1902 में वाराणसी (काशी) में पंडित मदन मोहन मालवीय, पंडित दीन दयाल शर्मा, और स्वामी ज्ञाननंद द्वारा।
  • पृष्ठभूमि: यह आर्य समाज, ब्रह्म समाज और थियोसोफिकल सोसाइटी के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए सनातनी (पारंपरिक) हिंदू धर्मगुरुओं और राजाओं का एक संयुक्त महासंघ था।
  • उद्देश्य:
    • पारंपरिक सनातन हिंदू धर्म, संस्कृत भाषा, और हिंदू धार्मिक ग्रंथों (शास्त्रों) का संरक्षण करना।
    • धार्मिक शिक्षा देने हेतु विद्यालयों और गुरुकुलों की स्थापना करना।
    • इसका मुख्यालय वाराणसी में बनाया गया था और इसने पूरे भारत में सनातनी चेतना जगाने का कार्य किया।
  • स्थापना की तिथि एवं स्थान: 12 जून 1905 को पुणे (महाराष्ट्र) में गोपाल कृष्ण गोखले (महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु) द्वारा।
  • मूल उद्देश्य:
    • भारत की सेवा के लिए समर्पित ऐसे राष्ट्रीय प्रचारक (National Missionaries) तैयार करना जो अपना जीवन देश सेवा में अर्पित कर सकें।
    • देशवासियों को निस्वार्थ भाव से मातृभूमि की सेवा करने के लिए प्रशिक्षित करना।
  • मुख्य कार्य क्षेत्र:
    • अकाल (Famine) और महामारी के समय राहत कार्य चलाना।
    • जनजातीय/आदिवासी (Tribal) कल्याण, दलितों का उत्थान, और प्राथमिक शिक्षा का प्रसार।
  • प्रमुख सदस्य: श्रीनिवास शास्त्री, जी.के. देवधर, एन.एम. जोशी, और हृदयनाथ कुंजरू। (नोट: महात्मा गांधी इसके सदस्य बनना चाहते थे, लेकिन मतभेदों के कारण उन्हें सदस्यता नहीं मिली)।
  • पत्रिका: द हितवाद (The Hitavada – 1911 से अंग्रेजी में प्रकाशित)।
  • स्थान एवं संस्थापक: 1911 में बॉम्बे में नारायण मल्हार जोशी (N.M. Joshi) द्वारा। (एन.एम. जोशी ‘सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी’ के ही सदस्य थे)।
  • मुख्य उद्देश्य:
    • आम जनता और विशेष रूप से औद्योगिक मजदूरों/श्रमिकों (Industrial Workers) की जीवन स्थितियों में सुधार करना।
    • गरीबों के लिए मुफ्त स्कूल, रात्रिकालीन कक्षाएं (Night Schools), औषधालय (Dispensaries), और पुस्तकालय खोलना।
    • झोपड़पट्टियों (Slums) में स्वच्छता और स्वास्थ्य जागरूकता फैलाना।
  • ऐतिहासिक संबंध: एन.एम. जोशी ने ही आगे चलकर 1920 में ‘अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ (AITUC) की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई थी।
  • स्थान एवं संस्थापक: 1914 में इलाहाबाद (प्रयागराज) में पंडित हृदयनाथ कुंजरू (Hridayanath Kunzru) द्वारा।
  • मूल उद्देश्य:
    • धार्मिक मेलों (जैसे कुंभ मेला), उत्सवों, और प्राकृतिक आपदाओं के समय तीर्थयात्रियों और आम जनता की निस्वार्थ सहायता करना।
    • समाज सेवी कार्यकर्ताओं (Scouts) को प्रशिक्षित करना।
    • शारीरिक शिक्षा, बाल कल्याण, और प्राथमिक शिक्षा का प्रसार करना।
  • विशेषता: यह बॉय स्काउट आंदोलन (Boy Scout Movement) का एक भारतीय विकल्प था जो पूर्णतः स्वदेशी सिद्धांतों पर आधारित था।
                       [मुस्लिम सुधार आंदोलन]
                                 │
     ┌───────────────────────────┴───────────────────────────┐
     │                                                       │
[सुधारवादी (Reformist)]                              [पुनरुत्थानवादी (Revivalist)]
 1. अलीगढ़ आंदोलन (सर सैयद अहमद खान)                    1. देवबंद आंदोलन (कासिम नानौतवी)
 2. अहमदिया आंदोलन (मिर्जा गुलाम अहमद)                  2. वहाबी आंदोलन (सैयद अहमद बरेलवी)
  • सर सैयद अहमद खान (1817–1898): ईस्ट इंडिया कंपनी में न्यायिक सेवा (मुंसिफ) में कार्यरत थे। 1857 की क्रांति के समय वे बिजनौर में तैनात थे और अंग्रेजों के प्रति वफादार रहे।
  • मूल विचार व दर्शन:
    • उनका मानना था कि मुसलमानों की धार्मिक और सामाजिक अवनति का मुख्य कारण आधुनिक शिक्षा से दूरी है।
    • उन्होंने कुरान की व्याख्या आधुनिक वैज्ञानिक एवं तार्किक दृष्टिकोण से की और कहा कि धर्म का कोई भी नियम यदि विज्ञान व तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता, तो वह परिवर्तनशील है।
    • उन्होंने पर्दा प्रथा, बहुविवाह, और बिना सोचे-समझे तलाक देने की प्रथा का कड़ा विरोध किया।
  • संस्थाएं:
    • 1864: गाजीपुर में साइंटिफिक सोसाइटी (Scientific Society) की स्थापना, जिसका काम अंग्रेजी की वैज्ञानिक पुस्तकों का उर्दू में अनुवाद करना था।
    • 1875: अलीगढ़ में ‘मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज’ (MAO College) की स्थापना (लॉर्ड लिटन ने इसकी आधारशिला रखी थी)। यही संस्थान 1920 में ‘अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय’ (AMU) बना।
    • 1886: ‘ऑल इंडिया मोहम्मडन एजुकेशनल कांफ्रेंस’ की स्थापना।
  • समाचार पत्र व रचनाएं:
    • तहज़ीब-उल-अखलाक़ (Tahzib-ul-Akhlaq – 1870): ‘सभ्यता और नैतिकता’ नाम की उर्दू पत्रिका।
    • असबब-ए-बग़ावत-ए-हिंद (1859): 1857 की क्रांति के कारणों पर किसी भारतीय द्वारा लिखी गई पहली पुस्तक।
  • कांग्रेस एवं राजनीतिक विचार:
    • शुरुआत में वे हिंदू-मुस्लिम एकता के समर्थक थे (उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों को ‘सुंदर भारत की दो आंखें’ कहा था)।
    • लेकिन बाद में (1885 के बाद) बनारस के राजा शिवप्रसाद के साथ मिलकर उन्होंने कांग्रेस के विरोध में ‘यूनिटेड इंडियन पैट्रियोटिक एसोसिएशन’ (1888) बनाई और मुसलमानों को कांग्रेस से दूर रहने की सलाह दी।
  • प्रकृति: यह एक कट्टरपंथी धार्मिक पुनरुत्थानवादी (Revivalist) आंदोलन था।
  • स्थापना: 1866 में सहारनपुर (यूपी) के देवबंद में मोहम्मद कासिम नानौतवी और रशीद अहमद गंगोही द्वारा दारुल उलूम (मदरसा) की स्थापना से हुई।
  • मुख्य उद्देश्य:
    • कुरान और हदीस की शुद्ध शिक्षाओं का मुस्लिम समाज में प्रसार करना।
    • विदेशी शासकों (अंग्रेजों) के खिलाफ ‘जिहाद’ (धार्मिक युद्ध) का आह्वान रखना।
    • अलीगढ़ आंदोलन द्वारा फैलाए जा रहे पश्चिमी/अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव को रोकना।
  • राजनीतिक दृष्टिकोण (कांग्रेस का समर्थन):
    • अलीगढ़ आंदोलन के विपरीत, देवबंद आंदोलन ने 1885 में बनी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का स्वागत किया
    • 1888 में देवबंद के उलेमाओं ने सर सैयद अहमद खान की ‘यूनिटेड पैट्रियोटिक एसोसिएशन’ के खिलाफ फतवा जारी किया।
    • मौलाना अबुल कलाम आजाद और महमूद-उल-हसन भी देवबंद विचारधारा से गहरे जुड़े थे।
  • संस्थापक: मिर्जा गुलाम अहमद द्वारा 1889 में कादियान (गुरदासपुर, पंजाब) में शुरू किया गया (इसलिए इसे ‘कादियानी आंदोलन’ भी कहते हैं)।
  • विचारधारा:
    • यह आंदोलन उदारवादी और तर्कसंगत सिद्धांतों पर आधारित था। इसने जिहाद (धर्मयुद्ध) का खंडन किया और गैर-मुसलमानों के प्रति शांति व भाईचारे का संदेश दिया।
    • मिर्जा गुलाम अहमद ने अपनी पुस्तक ‘बराहीन-ए-अहमदिया’ में अपने सिद्धांतों को प्रतिपादित किया।
    • इन्होंने स्वयं को पहले ‘मसीह’ (Messiah) और ‘महदी’, और बाद में ईश्वर का अवतार (श्रीकृष्ण का रूप) घोषित किया।
  • मूल प्रेरणा: अरब के अब्दुल वहाब और दिल्ली के शाह वलीउल्लाह के विचारों से प्रेरित।
  • भारत में नेता: सैयद अहमद बरेलवी (रायबरेली) और टीटू मीर।
  • मुख्य केंद्र: पटना (बिहार) इस आंदोलन का मुख्य केंद्र था।
  • उद्देश्य: भारत को ‘दारुल हरब’ (काफिरों का देश) से ‘दारुल इस्लाम’ (इस्लाम का देश) में बदलना। यह अंग्रेजों के खिलाफ एक सशस्त्र गुप्त धार्मिक-राजनीतिक विद्रोह था।
  • स्थान एवं संस्थापक: 1903 में केरल में श्री नारायण गुरु, डॉ. पद्माभन पाल्पू (Dr. Palpu) और महाकवि कुमारन असान (Kumaran Asan) द्वारा।
  • लक्षित वर्ग: केरल के ईझवा (Ezhava) समुदाय के सामाजिक, धार्मिक और शैक्षणिक उत्थान हेतु। ईझवा केरल की सबसे बड़ी पिछड़ा वर्ग आबादी थी, जिन्हें अछूत और अवर्ण माना जाता था।
  • अरुविप्पुरम आंदोलन (1888):
    • 1888 में शिवरात्रि के दिन श्री नारायण गुरु ने गैर-ब्राह्मण (अवर्ण) होने के बावजूद अरुविप्पुरम (केरल) में नेय्यार नदी के पत्थर को निकालकर शिवलिंग की स्थापना की
    • इन्होंने चुनौती देते हुए कहा: “हम उस ईश्वर की पूजा कर रहे हैं जिसकी कोई जाति नहीं है।”
  • मूल दर्शन एवं नारे:
    • “एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर मानव के लिए” (Oru Jathi, Oru Matham, Oru Daivam Manushyanu)।
    • (इनके शिष्य सहोदरन अय्यप्पन ने आगे चलकर इसे नया रूप दिया: “कोई जाति नहीं, कोई धर्म नहीं, कोई ईश्वर नहीं मानव के लिए”No Caste, No Religion, No God for Man)।
  • मुख्य कार्य: ईझवा समुदाय के लिए अलग मंदिर, स्कूल और आश्रम बनाए गए। मंदिर प्रवेश और सामाजिक समानता का मार्ग प्रशस्त किया।
  • स्थान एवं संस्थापक: 1925 में तमिलनाडु (मद्रास प्रेसीडेंसी) में ई.वी. रामास्वामी नायकर (पेरियार) द्वारा।
  • संस्थापक का इतिहास: पेरियार पहले कांग्रेस के नेता थे, लेकिन 1925 में सुचिंद्रम और वायकोम सत्याग्रह के दौरान कांग्रेस में उच्च जातीय वर्चस्व और भेदभाव के विरोध में इन्होंने कांग्रेस छोड़ दी।
  • मूल दर्शन एवं सिद्धांत:
    • ब्राह्मणवादी वर्चस्व का पूर्ण बहिष्कार: इन्होंने रामायण, मनुस्मृति और अन्य पौराणिक ग्रंथों को खारिज किया और ब्राह्मण पुरोहितों की मध्यस्थता के बिना ‘स्वाभिमान विवाह’ (Self-Respect Marriages) प्रथा चलाई (जिसे 1967 में तमिलनाडु सरकार ने कानूनी मान्यता दी)।
    • ईश्वरवाद और धार्मिक अंधविश्वासों का विरोध करते हुए नास्तिकता और बुद्धिवाद को बढ़ावा दिया।
  • पत्रिकाएं: कुडी अरासु (Kudi Arasu – 1925, तमिल में) और रिवोल्ट (Revolt – 1928, अंग्रेजी में)।
  • द्रविड़ कड़गम (1944): 1944 में जस्टिस पार्टी और आत्मसम्मान आंदोलन को मिलाकर ‘द्रविड़ कड़गम’ (DK) संगठन बना, जो आगे चलकर द्रविड़ राजनीति (DMK/AIADMK) का आधार बना।
  • बहिष्कृत हितकारिणी सभा (1924):
    • स्थापना: 20 जुलाई 1924 को बॉम्बे में डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा।
    • उद्देश्य: अछूतों में शिक्षा का प्रसार, आर्थिक स्थिति में सुधार और उनके अधिकारों की रक्षा।
    • मूल मंत्र: “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो” (Educate, Agitate, Organize)।
  • महाड़ सत्याग्रह / चवदार तालाब सत्याग्रह (1927):
    • तिथि: 20 मार्च 1927 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के महाड़ में।
    • उद्देश्य: सार्वजनिक चवदार तालाब से दलितों को पीने का पानी लेने का अधिकार दिलाना। इसे अंबेडकर ने दलितों की “सामाजिक स्वतंत्रता की घोषणा” कहा।
  • मनुस्मृति दहन (25 दिसंबर 1927): सामाजिक असमानता के प्रतीक के रूप में मनुस्मृति की प्रतियों को सार्वजनिक रूप से जलाया।
  • नासिक का कालाराम मंदिर सत्याग्रह (1930): 2 मार्च 1930 को नासिक के प्रसिद्ध कालाराम मंदिर में दलितों के प्रवेश हेतु बी.के. गायकवाड़ के साथ मिलकर सत्याग्रह चलाया।
  • अन्य संस्थाएं: इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (1936), ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन (1942)
  • पत्र-पत्रिकाएं: मूकनायक (1920 – पाक्षिक), बहिष्कृत भारत (1927 – मराठी), समता (1929), जनता (1930)।
  • स्थापना की तिथि एवं स्थान: 18 अक्टूबर 1906 को बॉम्बे में महर्षि विट्ठल रामजी शिंदे (V.R. Shinde) द्वारा।
  • मूल उद्देश्य:
    • अछूतों और दलितों के बीच अस्पृश्यता का अंत करना।
    • उनके बच्चों के लिए मुफ्त प्राथमिक विद्यालय, छात्रावास, और औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्र खोलना।
  • मुख्य योगदान: शिंदे ने 1917 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में अस्पृश्यता उन्मूलन का प्रस्ताव पारित करवाने में मुख्य भूमिका निभाई थी।
  • पुस्तक: भारतीय अस्पृश्यतेचा प्रश्न (भारत में अस्पृश्यता की समस्या – 1933)।
  • स्थान एवं संस्थापक: 1916 में मद्रास में डॉ. सी.एन. मुदलियार, टी.एम. नायर, और पी. त्यागराज चेट्टी द्वारा।
  • मूल संगठन: इसे शुरुआत में ‘साउथ इंडियन लिबरल फेडरेशन’ कहा गया था, जो अपनी समाचार पत्र ‘जस्टिस’ (Justice) के कारण ‘जस्टिस पार्टी’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
  • मुख्य उद्देश्य:
    • मद्रास प्रेसीडेंसी में विधायिका, सरकारी नौकरियों, और शिक्षा में गैर-ब्राह्मणों (Non-Brahmins) के प्रतिनिधित्व की मांग करना।
    • प्रांतीय राजनीति में ब्राह्मणों के एकाधिकार को समाप्त करना।
  • ऐतिहासिक उपलब्धि: 1919 के मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों के तहत जब 1920 में मद्रास में प्रांतीय चुनाव हुए, तो जस्टिस पार्टी ने बहुमत हासिल किया और ए. सुब्बारायुलु रेड्डीआर मद्रास के पहले मुख्यमंत्री बने। इन्होंने गैर-ब्राह्मणों के लिए नौकरियों में आरक्षण का पहला आदेश (Communal G.O. 1921) लागू किया।
  • स्थान एवं पृष्ठभूमि: त्रावणकोर (केरल) के कोटायम जिले के वायकोम (Vaikom) शिव मंदिर में।
  • मुख्य नेता: टी.के. माधवन, के.पी. केशव मेनन, और के. केलप्पन। (पेरियार भी इसमें शामिल हुए थे, जिस कारण उन्हें ‘वायकोम वीरन’ कहा गया)।
  • मुख्य उद्देश्य:
    • वायकोम मंदिर के चारों ओर की सार्वजनिक सड़कों पर अछूतों/अवर्णों (ईझवा, पुलाया आदि) के चलने के अधिकार के लिए अहिंसक सत्याग्रह। (यह मंदिर में प्रवेश का सत्याग्रह नहीं था, बल्कि मंदिर के आसपास की सड़कों के उपयोग का अधिकार था।)
  • परिणाम: महात्मा गांधी ने 1925 में त्रावणकोर की महारानी से मुलाकात की, जिसके बाद मंदिर की ओर जाने वाली तीन सड़कों को सभी जातियों के लिए खोल दिया गया।
  • स्थान एवं नेता: 1931 में केरल के तृिशूर जिले के प्रसिद्ध गुरुवायूर मंदिर में। इसका नेतृत्व के. केलप्पन (जिन्हें ‘केरल गांधी’ कहा जाता है) और एन.वी. मोयदीन ने किया।
  • मुख्य कार्यकर्ता: पी. कृष्णा पिल्लई (जिन्होंने मंदिर की घंटी बजाकर दलित प्रवेश की पहल की) और ए.के. गोपालन (A.K. Gopalan)
  • मुख्य उद्देश्य: गुरुवायूर के प्रसिद्ध कृष्ण मंदिर में दलितों (अछूतों) को सीधा प्रवेश दिलाने के लिए सत्याग्रह।
  • परिणाम: के. केलप्पन ने मंदिर प्रवेश के लिए 12 दिनों तक आमरण अनशन किया। गांधीजी के हस्तक्षेप पर अनशन समाप्त हुआ। भले ही तुरंत मंदिर नहीं खुला, लेकिन इस आंदोलन के प्रभाव से ही 12 नवंबर 1936 को त्रावणकोर के महाराजा ने ऐतिहासिक ‘मंदिर प्रवेश घोषणा’ (Temple Entry Proclamation) जारी की, जिससे सभी सरकारी मंदिर दलितों के लिए खोल दिए गए।

19वीं शताब्दी के मध्य में बॉम्बे में शिक्षित पारसी बुद्धिजीवियों द्वारा पारसी समाज (ज़ोरोस्ट्रियन समुदाय) में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों, धार्मिक अंधविश्वासों और महिलाओं की स्थिति में सुधार हेतु पुनर्जागरण की शुरुआत हुई।

  • स्थापना की तिथि एवं स्थान: 1851 में बॉम्बे में शिक्षित पारसी युवाओं के एक समूह द्वारा।
  • प्रमुख संस्थापक: नौरोजी फरदौनजी (Naoroji Furdoonji – प्रथम अध्यक्ष), दादाभाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji), एस.एस. बंगाली (S.S. Bengalee), खोरशेदजी कामा (K.R. Cama), और सोराबजी शापूरजी।
  • कोशिशें एवं मूल उद्देश्य:
    • पारसी धर्म को उसके मूल शुद्ध रूप (ज़ोरोस्ट्रियन धर्मग्रंथों) में पुनः स्थापित करना।
    • धार्मिक अनुष्ठानों और पुरोहितों (दस्तूरो) के आधिपत्य और अनावश्यक जटिल रीति-रिवाजों को समाप्त करना।
    • पारसी महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार करना—पर्दा प्रथा का पूर्ण उन्मूलन, विवाह की न्यूनतम आयु बढ़ाना, और बालिका शिक्षा को बढ़ावा देना।
  • मुख्य पत्र-पत्रिका – रास्त गोफ्तार (Rast Goftar):
    • 1851 में दादाभाई नौरोजी और के.एन. कामा के प्रयासों से ‘रास्त गोफ्तार’ (Truth Teller – सत्यवादी) नामक गुजराती साप्ताहिक समाचार पत्र शुरू किया गया।
    • यह समाचार पत्र इस सभा का मुख्य माउथपीस (वैचारिक पत्र) बना, जिसने पारसी समाज में नए और आधुनिक विचारों का संचार किया।
  • कानूनी एवं सामाजिक उपलब्धियां:
    • एस.एस. बंगाली और मालाबारी के प्रयासों से पारसी समुदाय के लिए ‘पारसी विवाह और तलाक अधिनियम 1865’ (Parsi Marriage and Divorce Act 1865) तथा ‘पारसी उत्तराधिकार अधिनियम’ (Parsi Succession Act) पारित हुए, जिससे महिलाओं को संपत्ति और तलाक के कानूनी अधिकार मिले।

19वीं और 20वीं शताब्दी में सिख धर्म को हिंदू धर्म के कर्मकांडों के बढ़ते प्रभाव, गुरुद्वारों के भ्रष्ट महंतों (उदासी संप्रदाय) के नियंत्रण, और ब्रिटिश शासन के दुष्प्रभावों से मुक्त कराने के लिए कई प्रमुख आंदोलन चलाए गए:

  • संस्थापक: बाबा दयाल दास (Rawalpindi / पंजाब में)।
  • मूल दर्शन एवं विचारधारा:
    • ‘निरंकारी’ शब्द का अर्थ है “निराकार ईश्वर का उपासक”
    • इन्होंने सिख धर्म में मूर्तिपूजा, कर्मकांडों, और बलि प्रथा का कड़ा विरोध किया तथा गुरु नानक देव जी की मूल शिक्षाओं पर बल दिया।
    • इन्होंने ईश्वर के निराकार रूप की पूजा करने और जीवित मानव गुरु के स्थान पर केवल ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ को ही सर्वोच्च मानने का उपदेश दिया।
    • विवाह और अंतिम संस्कार से ब्राह्मणवादी रीति-रिवाजों को पूरी तरह हटाकर सिख मर्यादा (आनंद कारज) को लागू करने पर जोर दिया।
  • संस्थापक: भगत जवाहरमल (उर्फ सियां साहब) द्वारा 1840 के दशक में शुरू किया गया, जिसे बाद में उनके शिष्य बाबा बालक सिंह और बाबा राम सिंह ने एक शक्तिशाली सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन में बदल दिया।
  • ‘कुका’ नाम क्यों पड़ा?: इस आंदोलन के अनुयायी पूजा/कीर्तन के दौरान तीव्र स्वर में चीखते या हुंकार भरते थे, जिसे पंजाबी में ‘कूक’ कहा जाता है। इसलिए इन्हें ‘कुका’ कहा गया।
  • सामाजिक व धार्मिक सुधार:
    • बाबा राम सिंह के नेतृत्व में इन्होंने जाति प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या, और गौ-हत्या का सख्त विरोध किया।
    • इन्होंने अंतर-जातीय विवाहों और विधवा पुनर्विवाह को बढ़ावा दिया तथा बिना किसी दहेज के केवल ₹1.25 पैसे में सामूहिक ‘आनंद कारज’ (विवाह) प्रथा शुरू की।
  • राजनैतिक व स्वदेशी पहलू (अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष):
    • यह भारत का पहला ऐसा आंदोलन था जिसने महात्मा गांधी से काफी पहले असहयोग (Non-Cooperation) और स्वदेशी के सिद्धांतों का प्रयोग किया।
    • इन्होंने ब्रिटिश अदालतों, डाक व्यवस्था, और विदेशी कपड़ों का पूर्ण बहिष्कार किया।
    • 1872 का कुका विद्रोह: 1872 में मोंटगोमरी और मलेरकोटला में गायों की हत्या के विरोध में कुकाओं और अंग्रेजों के बीच हिंसक झड़प हुई। ब्रिटिश सरकार ने 66 कुका विद्रोहियों को तोप के मुंह से बांधकर उड़ा दिया और बाबा राम सिंह को गिरफ्तार करके रंगून (बर्मा) निर्वासित कर दिया, जहां 1885 में उनकी मृत्यु हो गई।
  • स्थान एवं संस्थापक: 1873 में अमृतसर में ठाकुर सिंह संधावालिया और ज्ञानी ज्ञान सिंह द्वारा। (बाद में 1879 में लाहौर में एक दूसरी शाखा ‘लाहौर सिंह सभा’ बनी)।
  • पृष्ठभूमि एवं उद्देश्य:
    • यह ईसाइयों, आर्य समाज, और मुस्लिम मिशनरियों द्वारा सिखों के मतांतरण को रोकने के लिए शुरू किया गया एक अकादमिक/सुधारवादी आंदोलन था।
    • सिख धर्म को गैर-सिख परंपराओं, मूर्तिपूजा, और ब्राह्मणवादी कुरीतियों से मुक्त कराना।
    • सिखों में आधुनिक अंग्रेजी और गुरुमुखी शिक्षा का प्रसार करना।
  • संस्थागत उपलब्धि: 1892 में अमृतसर में ‘खालसा कॉलेज’ की स्थापना की गई, जो आगे चलकर सिख बौद्धिक चेतना का मुख्य केंद्र बना।
  • प्रकृति: यह सिंह सभा आंदोलन की ही एक मुख्य और अहिंसक शाखा थी, जो गुरुद्वारों को भ्रष्ट और चरित्रहीन महंतों से आजाद कराने के लिए चलाई गई थी।
  • पृष्ठभूमि: पंजाब के ऐतिहासिक गुरुद्वारों पर ‘उदासी महंतों’ का नियंत्रण था, जिन्हें अंग्रेजों का संरक्षण प्राप्त था। ये महंत गुरुद्वारों की संपत्ति का दुरुपयोग कर रहे थे, अनैतिक गतिविधियों में लिप्त थे और अछूतों/दलितों को प्रवेश नहीं करने देते थे।
  • प्रमुख घटनाएं:
    • ननकाना साहिब कांड (1921): गुरुद्वारा ननकाना साहिब के भ्रष्ट महंत नारायण दास के गुंडों ने 130 से अधिक शांतिप्रिय अकाली जत्थों की निर्मम हत्या कर दी, जिससे पूरे देश में आक्रोश फैल गया।
    • चाभियों का मोर्चा (Keys Affair – 1921): लाहौर के डिप्टी कमिश्नर ने स्वर्ण मंदिर के तोषाखाने की चाभियां जब्त कर लीं। अकालियों के उग्र अहिंसक विरोध के आगे अंग्रेजों को झुकना पड़ा और चाभियां बाबा खड़क सिंह को सौंपी गईं। (गांधीजी ने इसे “भारत के स्वतंत्रता संग्राम की पहली निर्णायक जीत” कहा था)।
    • जैतो का मोर्चा (1923): पंडित जवाहरलाल नेहरू भी इसमें शामिल हुए थे और उन्हें गिरफ्तार किया गया था।
  • ऐतिहासिक परिणाम (SGPC & Act 1925):
    • 16 नवंबर 1920: ‘शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी’ (SGPC) का गठन गुरुद्वारों के प्रबंधन हेतु किया गया।
    • अकाली दल (1920): अकालियों के राजनीतिक विंग के रूप में ‘शिरोमणि अकाली दल’ का गठन हुआ।
    • सिख गुरुद्वारा अधिनियम 1925 (Sikh Gurdwara Act 1925): इस कानून के पारित होने के बाद पंजाब के सभी ऐतिहासिक गुरुद्वारों का प्रशासनिक नियंत्रण पूरी तरह से लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई SGPC के हाथों में सौंप दिया गया।

19वीं और 20वीं शताब्दी में भारतीय समाज सुधारकों के अथक प्रयासों और ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाए गए प्रमुख सामाजिक एवं धार्मिक कानूनों का विस्तृत, नियम-वार (Section-wise) विवरण निम्नलिखित है:

  • पृष्ठभूमि: राजपूतों और उत्तर-पश्चिम भारत की कुछ उच्च जातियों में बालिका शिशु के जन्म को आर्थिक बोझ और सामाजिक नीचा दिखाने वाला मानकर जन्म लेते ही उसकी हत्या (दूध-पीती प्रथा) कर दी जाती थी।
  • 1795 का बंगाल नियमन XXI (Bengal Regulation XXI of 1795): लॉर्ड सर जॉन शोर के समय बाल हत्या को साधारण हत्या (Murder) के समान अपराध घोषित किया गया।
  • 1804 का नियमन III (Regulation III of 1804): लॉर्ड वेलेस्ली द्वारा इस नियम को पूरे बंगाल प्रेसीडेंसी और नए अधिग्रहित क्षेत्रों में सख्ती से लागू किया गया।
  • बालिका शिशु हत्या निवारण अधिनियम 1870 (Female Infanticide Prevention Act, 1870): इसके तहत सभी नवजात बालिकाओं के जन्म का पंजीकरण (Registration) अनिवार्य कर दिया गया और पुलिस को संदेह होने पर किसी भी घर की तलाशी लेने का अधिकार दिया गया।
  • मुख्य प्रयासकर्ता: राजा राममोहन राय (जिन्होंने अपने भाई जगमोहन की मृत्यु के बाद अपनी भाभी को जबरन सती होते देखा था और इसके खिलाफ ‘संवाद कौमुदी’ के माध्यम से लगातार अभियान चलाया)।
  • कानून की घोषणा: 4 दिसंबर 1829 को गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिंक द्वारा बंगाल सती नियमन XVII (Bengal Sati Regulation XVII, 1829) पारित किया गया।
  • कानूनी प्रावधान: इसके तहत सती प्रथा को पूरी तरह गैर-कानूनी, अमानवीय और ‘गैर-इरादतन हत्या’ (Culpable Homicide) घोषित किया गया। सती करने में सहायता करने वालों के लिए मृत्युदंड और आजीवन कारावास का प्रावधान किया गया।
  • भौगोलिक विस्तार (Geographical Scope):
    • 1829 में यह कानून केवल बंगाल प्रेसीडेंसी में लागू किया गया था।
    • 1830 में इसे बॉम्बे और मद्रास प्रेसीडेंसियों में भी लागू कर दिया गया।
  • चार्टर एक्ट 1833 का निर्देश: 1833 के चार्टर अधिनियम की धारा 88 में ब्रिटिश सरकार को भारत से दास प्रथा समाप्त करने का निर्देश दिया गया था।
  • अधिनियम V, 1843 (Indian Slavery Act, 1843): गवर्नर जनरल लॉर्ड एलिनबरो (Lord Ellenborough) के शासनकाल में 1843 के अधिनियम V (Act V of 1843) द्वारा भारत में दास प्रथा को पूरी तरह गैर-कानूनी घोषित किया गया।
  • प्रावधान: दासों के क्रय-विक्रय पर रोक लगा दी गई, दासों पर मालिकों के कानूनी दावों को समाप्त कर दिया गया, और दासों को आम नागरिकों की तरह कानूनी अधिकार दिए गए।
  • मुख्य प्रयासकर्ता: पंडित ईश्वर चंद्र विद्यासागर (संस्कृत कॉलेज, कलकत्ता के प्राचार्य), जिन्होंने शास्त्रों और वेदों के प्रमाण प्रस्तुत करके साबित किया कि हिंदू धर्मशास्त्रों में विधवा पुनर्विवाह की अनुमति है। (इन्होंने 7 दिसंबर 1856 को अपने खर्च पर पहला वैध विधवा पुनर्विवाह करवाया था)।
  • अन्य प्रमुख योगदानकर्ता: महाराष्ट्र में जगन्नाथ सेठ और विष्णु शास्त्री पंडित (जिन्होंने 1850 में ‘पुनर्विवाह उत्तेजक मंडल’ बनाया) तथा दक्षिण भारत में कंदुकुरी वीरेशलिंगम पंतुलु
  • कानून का पारित होना:
    • इस कानून का मसौदा (Draft) लॉर्ड डलहौजी के समय तैयार हुआ था।
    • इसे 26 जुलाई 1856 को लॉर्ड कैनिंग के शासनकाल में अधिनियम XV (Act XV of 1856) के रूप में पास और लागू किया गया।
  • कानूनी प्रावधान: विधवाओं के पुनर्विवाह को पूर्ण कानूनी मान्यता दी गई और ऐसे विवाहों से उत्पन्न बच्चों को वैध (Legitimate) माना गया। (हालांकि, पुनर्विवाह करने पर महिला को अपने मृत पति की संपत्ति से अधिकार गंवाना पड़ता था)।
  • मुख्य प्रयासकर्ता: केशव चंद्र सेन (भारतीय ब्रह्म समाज के नेता)।
  • कानून का नाम: इसे अधिनियम III, 1872 (Act III of 1872) या ‘ब्राह्म विवाह अधिनियम’ भी कहा जाता है।
  • कानूनी प्रावधान:
    • यह उन लोगों के लिए एक नागरिक विवाह (Civil Marriage) कानून था जो किसी भी पारंपरिक धर्म (हिंदू, मुस्लिम, ईसाई आदि) के धार्मिक रीति-रिवाजों को नहीं मानना चाहते थे।
    • इसके तहत बहुविवाह (Polygamy) को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया।
    • विवाह की न्यूनतम आयु: लड़कियों के लिए न्यूनतम 14 वर्ष और लड़कों के लिए 18 वर्ष तय की गई। (हालांकि, यह कानून केवल उन पर लागू होता था जो स्वयं को हिंदू, मुस्लिम या किसी स्थापित धर्म का नहीं घोषित करते थे, इसलिए इसका दायरा सीमित रहा)।
  • मुख्य प्रयासकर्ता: प्रसिद्ध पारसी समाज सुधारक बेहरामजी एम. मालाबारी (B.M. Malabari)
  • तात्कालिक कारण: 1889 में बॉम्बे में 35 वर्षीय हरिमोहन मैती द्वारा अपनी 10 वर्षीया बाल-पत्नी फूलमनी दासी (Phulmoni Dasi) के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाने के कारण हुई मृत्यु की दर्दनाक घटना।
  • गवर्नर जनरल: लॉर्ड लैंसडाउन के समय पारित।
  • कानूनी प्रावधान:
    • इसके तहत लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध (सहमति की आयु) की न्यूनतम सीमा 10 वर्ष से बढ़ाकर 12 वर्ष कर दी गई। 12 वर्ष से कम आयु की लड़की से विवाह के बाद भी शारीरिक संबंध बनाना बलात्कार (Rape) का अपराध माना गया।
  • ऐतिहासिक विवाद (बाल गंगाधर तिलक का विरोध):
    • लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इस कानून का तीव्र विरोध किया था।
    • तिलक का तर्क: तिलक बाल विवाह के समर्थक नहीं थे, लेकिन उनका मानना था कि किसी विदेशी/ब्रिटिश सरकार को भारतीय समाज के घरेलू और धार्मिक मामलों में कानून बनाकर हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। भारतीय समाज को अपने सुधार स्वयं करने चाहिए।
  • मुख्य प्रयासकर्ता: राजस्थान के प्रसिद्ध शिक्षाविद और समाज सुधारक राय साहब हरबिलास शारदा
  • कानून का पारित होना: यह विधेयक 1929 में पेश हुआ और 1 अप्रैल 1930 को लॉर्ड इरविन के शासनकाल में लागू हुआ।
  • कानूनी प्रावधान:
    • बाल विवाह पर रोक लगाने हेतु विवाह की न्यूनतम आयु लड़कियों के लिए 14 वर्ष और लड़ककों के लिए 18 वर्ष तय की गई।
    • यह कानून पूरे ब्रिटिश भारत के सभी समुदायों (हिंदू, मुस्लिम आदि) पर लागू किया गया था।
  • उत्तरवर्ती संशोधन (Post-Independence Amendments):
    • 1978 का संशोधन: इसके तहत विवाह की न्यूनतम आयु बढ़ाकर लड़कियों के लिए 18 वर्ष और लड़कों के लिए 21 वर्ष कर दी गई।
    • बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006: शारदा अधिनियम को निरस्त करके इसे ‘बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006’ (Prohibition of Child Marriage Act, 2006) से बदल दिया गया।
  • भारतीय पुनर्जागरण के पिता: राजा राममोहन राय।
  • ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के लेखक: स्वामी दयानंद सरस्वती (हिंदी भाषा)।
  • ‘वेदों की ओर लौटो’ का नारा: स्वामी दयानंद सरस्वती।
  • ‘गुलामगिरी’ पुस्तक के लेखक: ज्योतिबा फुले (1873)।
  • 1893 के शिकागो धर्म सम्मेलन में भाषण: स्वामी विवेकानंद।
  • ‘महाराष्ट्र का सुकरात’: महादेव गोविंद रानाडे (M.G. Ranade)।
  • विधवा पुनर्विवाह कानून (1856) किसके प्रयासों से बना: ईश्वर चंद्र विद्यासागर।
  • ‘रास्त गोफ्तार’ पत्रिका किस आंदोलन से संबंधित थी: पारसी सुधार आंदोलन (दादाभाई नौरोजी)।
  • ‘एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर’ का नारा: श्री नारायण गुरु।
  • शारदा एक्ट (1930) के समय विवाह की आयु: लड़कियां (14 वर्ष), लड़के (18 वर्ष)।

Q1. निम्नलिखित में से किसने 1828 में ‘ब्रह्म समाज’ की स्थापना की थी?

  • (A) स्वामी दयानंद सरस्वती
  • (B) राजा राममोहन राय
  • (C) केश्व चंद्र सेन
  • (D) देवेंद्रनाथ टैगोर

उत्तर: (B)

व्याख्या: राजा राममोहन राय ने 20 अगस्त 1828 को कलकत्ता में ‘ब्रह्म सभा’ की स्थापना की, जिसे बाद में ‘ब्रह्म समाज’ कहा गया।

Q2. ‘सत्यार्थ प्रकाश’ ग्रंथ की रचना किसके द्वारा की गई थी?

  • (A) स्वामी विवेकानंद
  • (B) राजा राममोहन राय
  • (C) स्वामी दयानंद सरस्वती
  • (D) रामकृष्ण परमहंस

उत्तर: (C)

व्याख्या: स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 में हिंदी भाषा में ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की रचना की थी, जो आर्य समाज का मूल ग्रंथ है।

Q3. 1856 में पारित ‘हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम’ को लागू कराने में किस भारतीय समाज सुधारक का मुख्य योगदान था?

  • (A) राजा राममोहन राय
  • (B) ईश्वर चंद्र विद्यासागर
  • (C) ज्योतिबा फुले
  • (D) के.वी. पंतुलु

उत्तर: (B)

व्याख्या: पंडित ईश्वर चंद्र विद्यासागर के अथक प्रयासों से लॉर्ड कैनिंग के शासनकाल में 1856 का ‘हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम’ (Act XV) पारित हुआ था।

Q4. ‘गुलामगिरी’ पुस्तक के लेखक कौन थे?

  • (A) डॉ. बी.आर. अंबेडकर
  • (B) ज्योतिबा फुले
  • (C) महात्मा गांधी
  • (D) ई.वी. रामास्वामी नायकर

उत्तर: (B)

व्याख्या: ज्योतिबा फुले ने 1873 में ‘गुलामगिरी’ पुस्तक लिखी थी, जिसे उन्होंने अमेरिका के नीग्रो दासों को समर्पित किया था।

Q5. 1891 के ‘सम्मति आयु अधिनियम’ (Age of Consent Act) को पारित करवाने में किसकी मुख्य भूमिका थी?

  • (A) ईश्वर चंद्र विद्यासागर
  • (B) बी.एम. मालाबारी
  • (C) हरबिलास शारदा
  • (D) बाल गंगाधर तिलक

उत्तर: (B)

व्याख्या: पारसी सुधारक बेहरामजी एम. मालाबारी के प्रयासों से 1891 का सम्मति आयु अधिनियम पारित हुआ, जिसने लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु 12 वर्ष कर दी।

Q1. ब्रह्म समाज के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. इसने बहुदेववाद और मूर्तिपूजा का विरोध किया।
  2. इसने वेदों को त्रुटिहीन (Infallible) माना।
  3. इसने उपनिषदों की शिक्षाओं का समर्थन किया।उपर्युक्त में से कौन-से कथन सत्य हैं?
  • (A) केवल 1 और 2
  • (B) केवल 2 और 3
  • (C) केवल 1 और 3
  • (D) 1, 2 और 3

उत्तर: (C)

व्याख्या: ब्रह्म समाज ने मूर्तिपूजा का विरोध किया और उपनिषदों पर जोर दिया (कथन 1 और 3 सत्य हैं)। वेदों को त्रुटिहीन (Infallible) स्वामी दयानंद सरस्वती (आर्य समाज) ने माना था, ब्रह्म समाज ने नहीं (कथन 2 असत्य है)।

Q2. सूची-I (संस्था) को सूची-II (संस्थापक) के साथ सुमेलित कीजिए:

सूची-I (संस्था)सूची-II (संस्थापक)
a. तत्वबोधिनी सभा1. डॉ. आत्माराम पांडुरंग
b. प्रार्थना समाज2. देवेंद्रनाथ टैगोर
c. सत्यशोधक समाज3. हेनरी विवियन डेरोजियो
d. यंग बंगाल आंदोलन4. ज्योतिबा फुले
  • (A) a-2, b-1, c-4, d-3
  • (B) a-1, b-2, c-3, d-4
  • (C) a-2, b-4, c-1, d-3
  • (D) a-4, b-3, c-2, d-1

उत्तर: (A)

Q3. अलीगढ़ आंदोलन के संबंध में कौन सा कथन असत्य है?

  • (A) इसकी शुरुआत सर सैयद अहमद खान ने की थी।
  • (B) इन्होंने ‘तहज़ीब-उल-अखलाक़’ नामक उर्दू पत्रिका निकाली।
  • (C) इन्होंने शुरू से ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का समर्थन किया था।
  • (D) इन्होंने 1875 में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना की।

उत्तर: (C)

व्याख्या: कथन (C) असत्य है। सर सैयद अहमद खान ने कांग्रेस का विरोध किया था और मुसलमानों को कांग्रेस से दूर रहने की सलाह दी थी।

Q4. “एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर मानव के लिए” का नारा किसने दिया था?

  • (A) ज्योतिबा फुले
  • (B) श्री नारायण गुरु
  • (C) डॉ. बी.आर. अंबेडकर
  • (D) ई.वी. रामास्वामी नायकर

उत्तर: (B)

व्याख्या: केरल के समाज सुधारक श्री नारायण गुरु ने ईझवा समुदाय के उत्थान के लिए SNDP की स्थापना की और यह प्रसिद्ध नारा दिया था।

Q5. निम्नलिखित में से कौन सा अधिनियम/कानून लॉर्ड विलियम बैंटिंक के शासनकाल में पारित हुआ था?

  • (A) हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856
  • (B) सती प्रथा निषेध अधिनियम 1829
  • (C) शारदा अधिनियम 1930
  • (D) सम्मति आयु अधिनियम 1891

उत्तर: (B)

व्याख्या: सती प्रथा निषेध नियम XVII 1829 में लॉर्ड विलियम बैंटिंक के समय पारित हुआ था।

Q1: राजा राममोहन राय को ‘राजा’ की उपाधि किसने और क्यों दी थी?

उत्तर: राजा राममोहन राय को ‘राजा’ की उपाधि मुगल सम्राट अकबर द्वितीय ने 1830 में दी थी। अकबर द्वितीय ने उन्हें अपनी पेंशन बढ़ाने की सिफारिश करने के लिए ब्रिटेन के राजा विलियम चतुर्थ के दरबार में अपना दूत बनाकर भेजा था।

Q2: दयानंद सरस्वती और राजा राममोहन राय के वेदों के दृष्टिकोण में क्या अंतर था?

उत्तर: स्वामी दयानंद सरस्वती वेदों को अपौरुषेय और पूर्णतः त्रुटिहीन (Infallible) मानते थे और उन्होंने “वेदों की ओर लौटो” का नारा दिया। इसके विपरीत, राजा राममोहन राय ने उपनिषदों पर बल दिया लेकिन किसी भी धार्मिक ग्रंथ को मानव बुद्धि और तर्क से ऊपर या त्रुटिहीन स्वीकार नहीं किया।

Q3: स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण की क्या मुख्य विशेषता थी?

उत्तर: 11 सितंबर 1893 को शिकागो विश्व धर्म संसद में विवेकानंद ने अपने भाषण की शुरुआत “Sisters and Brothers of America” (मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों) से की थी। उन्होंने सर्वधर्म समभाव, सहिष्णुता और भारतीय वेदांत दर्शन की श्रेष्ठता को वैश्विक मंच पर स्थापित किया।

Q4: बाल गंगाधर तिलक ने 1891 के ‘सम्मति आयु अधिनियम’ (Age of Consent Act) का विरोध क्यों किया था?

उत्तर: तिलक महिलाओं के अधिकारों या सुधार के विरोधी नहीं थे, लेकिन उनका मानना था कि विदेशी अंग्रेज सरकार को भारतीय समाज के धार्मिक व घरेलू रीति-रिवाजों में कानून बनाकर हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। भारतीय समाज को अपने सुधार स्वयं करने चाहिए।

Q5: देवबंद आंदोलन और अलीगढ़ आंदोलन में मुख्य वैचारिक अंतर क्या था?

उत्तर: अलीगढ़ आंदोलन एक सुधारवादी आंदोलन था जो मुस्लिम समाज में पश्चिमी/अंग्रेजी शिक्षा और आधुनिकता का समर्थन करता था। इसके विपरीत, देवबंद आंदोलन एक पुनरुत्थानवादी आंदोलन था जो अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमीकरण का विरोधी था तथा इस्लामिक ग्रंथों की शुद्धता और अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद पर बल देता था।

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