Fundamental Rights (मौलिक अधिकार) – Article 12 to 35 Complete Master Notes

मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) भारतीय संविधान की आत्मा और रीढ़ की हड्डी हैं। ये वे बुनियादी अधिकार हैं जो प्रत्येक नागरिक के भौतिक, बौद्धिक, नैतिक और आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

इन्हें ‘मौलिक’ (Fundamental) इसलिए कहा जाता है क्योंकि:

  1. इन्हें देश के सर्वोच्च कानून — संविधान द्वारा गारंटी और सुरक्षा प्रदान की गई है।
  2. ये न्यायसंगत (Justiciable) हैं, अर्थात इनके उल्लंघन पर नागरिक सीधे सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) या उच्च न्यायालय (High Court) का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

भारतीय संविधान के भाग III (Part III) में अनुच्छेद 12 से 35 तक मौलिक अधिकारों का विशद वर्णन किया गया है। भाग III को “भारत का अधिकार पत्र” (Magna Carta of India) भी कहा जाता है।

सरल शब्दों में:

मौलिक अधिकार राज्य (सरकार) की स्वेच्छाचारी (Arbitrary) और तानाशाही शक्तियों पर सीमाएं (Limitations) लगाते हैं। ये नागरिकों को स्वतंत्रता का आश्वासन देते हैं और देश में “कानून का शासन” (Rule of Law) स्थापित करते हैं, न कि व्यक्तियों का शासन।

संवैधानिक परिप्रेक्ष्य:

“मौलिक अधिकार राज्य के विरुद्ध नागरिकों को दिए गए वे दावे (Claims) हैं जो विधायिका और कार्यपालिका की निरंकुशता से व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं।”

  • नकारात्मक एवं सकारात्मक प्रकृति (Negative vs Positive Nature):
    • अधिकांश मौलिक अधिकार नकारात्मक प्रकृति के हैं क्योंकि वे राज्य पर कुछ कार्य करने से रोक (Injunctions) लगाते हैं (जैसे—अनुच्छेद 14: राज्य किसी से भेदभाव नहीं करेगा)।
    • कुछ अधिकार सकारात्मक प्रकृति के हैं जो नागरिकों को विशेष सुविधाएं देते हैं (जैसे—अनुच्छेद 21A: शिक्षा का अधिकार)।
  • असीमित नहीं, बल्कि सीमित (Not Absolute, but Qualified): मौलिक अधिकार असीमित (Absolute) नहीं हैं। राज्य समाज के हित में, राष्ट्र की संप्रभुता, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए इन पर युक्तियुक्त प्रतिबंध (Reasonable Restrictions) लगा सकता है।
  • मैग्ना कार्टा (Magna Carta): 1215 में इंग्लैंड के राजा जॉन द्वारा जारी किया गया अधिकारों का पहला लिखित दस्तावेज। इसीलिए भारतीय संविधान के भाग III को ‘भारत का मैग्ना कार्टा’ कहते हैं।
  • न्यायसंगतता (Justiciability): यदि किसी नागरिक के मौलिक अधिकार का हनन होता है, तो वह अदालत में जाकर उसे लागू करवा सकता है।
  • राज्य (State – Article 12): मौलिक अधिकारों के संदर्भ में ‘राज्य’ के अंतर्गत केंद्र व राज्य सरकारें, संसद व राज्य विधायिकाएँ, स्थानीय प्राधिकरण (नगरपालिका, पंचायत) और अन्य वैधानिक संस्थाएँ (LIC, ONGC, SAIL आदि) आती हैं।
  • आच्छादन का सिद्धांत (Doctrine of Eclipse): यदि संविधान लागू होने से पहले का कोई कानून मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो वह कानून पूरी तरह नष्ट नहीं होता, बल्कि मौलिक अधिकार उस पर ‘छाया’ (Eclipse) बना लेते हैं।
  1. 1895 का स्वराज विधेयक: बाल गंगाधर तिलक द्वारा तैयार इस विधेयक में पहली बार मौलिक अधिकारों की मांग की गई थी।
  2. 1928 की नेहरू रिपोर्ट: पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली समिति ने संविधान में स्पष्ट रूप से मौलिक अधिकारों को शामिल करने की सिफारिश की।
  3. 1931 का कराची अधिवेशन: सरदार वल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता में कांग्रेस ने मौलिक अधिकारों पर एक औपचारिक प्रस्ताव पारित किया।
  4. संविधान सभा की परामर्श समिति: सरदार पटेल की अध्यक्षता में मौलिक अधिकारों पर एक उप-समिति बनाई गई जिसके अध्यक्ष जे.बी. कृपलानी थे।
  5. अंगीकरण: अमेरिका के संविधान (Bill of Rights) से प्रेरित होकर भारतीय संविधान में भाग III को शामिल किया गया।

मूल संविधान में 7 मौलिक अधिकार थे। हालांकि, 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा ‘संपत्ति के अधिकार’ (Right to Property – Article 31) को मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया गया और इसे भाग XII के अनुच्छेद 300A के तहत एक कानूनी/संवैधानिक अधिकार (Legal Right) बना दिया गया।

वर्तमान में नागरिकों को 6 मौलिक अधिकार प्राप्त हैं:

                          [6 मौलिक अधिकार]
                                 │
     ┌───────────────────────────┼───────────────────────────┐
     │                           │                           │
(1) समता का अधिकार         (2) स्वतंत्रता का अधिकार   (3) शोषण के विरुद्ध अधिकार
   (Art. 14 - 18)             (Art. 19 - 22)             (Art. 23 - 24)
     │                           │                           │
     ├───────────────────────────┼───────────────────────────┤
     │                           │                           │
(4) धर्म की स्वतंत्रता       (5) संस्कृति व शिक्षा      (6) संवैधानिक उपचारों 
    (Art. 25 - 28)               (Art. 29 - 30)            का अधिकार (Art. 32)

मौलिक अधिकार मुख्य रूप से राज्य की कार्रवाई के खिलाफ उपलब्ध हैं। ‘राज्य’ में शामिल हैं:

  1. भारत की सरकार और संसद।
  2. राज्य सरकारें और राज्य विधानमंडल।
  3. सभी स्थानीय प्राधिकारी (नगरपालिकाएं, पंचायतें, जिला बोर्ड)।
  4. अन्य प्राधिकारी (वैधानिक या गैर-वैधानिक संस्थाएं जैसे- LIC, ONGC, GAIL आदि)।
  • यह अनुच्छेद न्यायपालिका को न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) की शक्ति प्रदान करता है।
  • कोई भी ऐसा कानून जो मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता हो, उल्लंघन की सीमा तक शून्य (Void) घोषित कर दिया जाएगा।

अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समता एवं कानूनों का समान संरक्षण

  • विधि के समक्ष समता (Equality before Law): यह ब्रिटिश परंपरा से लिया गया नकारात्मक विचार है। इसका अर्थ है कि कानून की नजर में सभी समान हैं, कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है।
  • कानूनों का समान संरक्षण (Equal Protection of Laws): यह अमेरिकी संविधान से लिया गया सकारात्मक विचार है। इसका अर्थ है कि समान परिस्थितियों वाले लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाएगा (Like should be treated alike)।
  • राज्य केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर किसी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं करेगा।
  • अपवाद: महिलाओं, बच्चों, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC), SC, ST और EWS के लिए विशेष प्रावधान (आरक्षण) बनाए जा सकते हैं।
  • सरकारी नौकरियों में सभी नागरिकों को समान अवसर मिलेंगे।
  • अपवाद: पिछड़े वर्गों (OBCs), SC, ST और EWS (103वां संशोधन) के लिए आरक्षण का प्रावधान।
  • अस्पृश्यता (छुआछूत) का किसी भी रूप में आचरण करना पूरी तरह प्रतिबंधित और एक दंडनीय अपराध है। इसके लिए संसद ने नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 (Protection of Civil Rights Act) बनाया।
  • नोट: संविधान में ‘अस्पृश्यता’ शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है।
  • राज्य सेना या विद्या (Education) संबंधी सम्मान के अलावा कोई अन्य उपाधि (जैसे—सर, राय बहादुर, महाराजा) प्रदान नहीं करेगा।
  • भारत रत्न, पद्म विभूषण आदि ‘उपादियां’ नहीं बल्कि ‘पुरस्कार’ (Awards) हैं (बालाजी राघवन् केस, 1996)।

अनुच्छेद 19(1) नागरिकों को 6 लोकतांत्रिक स्वतंत्रताएं देता है:

  1. 19(1)(a): वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech & Expression) – इसी में प्रेस की स्वतंत्रता और सूचना का अधिकार शामिल है।
  2. 19(1)(b): शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के सम्मेलन की स्वतंत्रता।
  3. 19(1)(c): संघ, संगठन या सहकारी समितियां (Cooperative Societies) बनाने की स्वतंत्रता।
  4. 19(1)(d): भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र में अबाध संचरण (Movement) की स्वतंत्रता।
  5. 19(1)(e): भारत के किसी भी भाग में निवास करने और बसने की स्वतंत्रता।
  6. 19(1)(g): कोई भी वृत्ति, व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता।(नोट: 19(1)(f) संपत्ति का अधिकार था जिसे 44वें संशोधन द्वारा हटा दिया गया।)

यह तीन प्रकार की सुरक्षा देता है:

  1. कार्योत्तर विधि से संरक्षण (No Ex-post Facto Law): किसी व्यक्ति को केवल उसी कानून के तहत सजा दी जा सकती है जो अपराध करते समय लागू था।
  2. दोहरे दंड से संरक्षण (No Double Jeopardy): एक ही अपराध के लिए किसी व्यक्ति को एक से अधिक बार दंडित नहीं किया जाएगा।
  3. स्व-अभिशंसन से संरक्षण (No Self-Incrimination): किसी अभियुक्त को खुद के खिलाफ गवाही देने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा।

“किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया (Procedure Established by Law) के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।”

  • विस्तार (Menaka Gandhi Case 1978): उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या करते हुए इसे केवल ‘जीवित रहने’ तक सीमित नहीं रखा, बल्कि “गरिमापूर्ण जीवन” (Life with Dignity) का अधिकार माना।
  • इसके तहत शामिल प्रमुख अधिकार: निजता का अधिकार (Right to Privacy – Puttaswamy Case 2017), स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार, आजीविका का अधिकार, सोने का अधिकार, और मनपसंद व्यक्ति से विवाह करने का अधिकार (Hadiya Case)।
  • 86वें संविधान संशोधन 2002 द्वारा जोड़ा गया।
  • राज्य 6 से 14 वर्ष की आयु वाले सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगा। (इसके क्रियान्वयन के लिए RTE Act 2009 लागू हुआ)।
  • साधारण हिरासत (Punitiveness): गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होगा, तथा उसे अपनी पसंद के वकील से सलाह लेने का अधिकार होगा।
  • निवारक निरोध (Preventive Detention): किसी व्यक्ति को अपराध करने से रोकने के लिए बिना मुकदमे के अधिकतम 3 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है (सलाहकार बोर्ड की अनुमति के बिना)।
  • मानव तस्करी (Human Trafficking), बेगार (बिना मजदूरी के काम) और जबरन श्रम (Forced Labour) को पूरी तरह प्रतिबंधित करता है।
  • 14 वर्ष से कम आयु के किसी भी बच्चे को कारखानों, खानों (Mines) या अन्य जोखिम भरे कार्यों में नियोजन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है।
  • प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी धर्म को मानने और उसका प्रचार करने की व्यक्तिगत स्वतंत्रता है। (नोट: इसमें किसी का ‘जबरन धर्म परिवर्तन’ कराने का अधिकार शामिल नहीं है)।
  • धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक संस्थानों की स्थापना, रखरखाव और संपत्ति के प्रबंधन का अधिकार।
  • राज्य किसी भी नागरिक पर ऐसा कोई कर (Tax) नहीं लगाएगा जिसकी आय किसी विशेष धर्म को बढ़ावा देने में खर्च होती हो। (शुल्क/Fee लगाई जा सकती है, Tax नहीं)।
  • राज्य निधि (Government Funds) से पूरी तरह पोषित किसी भी शिक्षण संस्थान में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी
  • भारत के किसी भी भाग में रहने वाले नागरिकों के किसी भी वर्ग को अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति को सुरक्षित रखने का अधिकार है।
  • सभी अल्पसंख्यकों (धार्मिक या भाषाई) को अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का अधिकार है।

डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को “संविधान का हृदय और आत्मा” (Heart and Soul of the Constitution) कहा था। इसके बिना अन्य सभी मौलिक अधिकार अर्थहीन हैं, क्योंकि यह अधिकारों के हनन पर न्याय पाने का जरिया है।

अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) और अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय (High Court) 5 प्रकार की रिट जारी कर सकते हैं:

रिट का नाम (Writ Name)शाब्दिक अर्थ (Literal Meaning)उद्देश्य / प्रयोग (Purpose)
1. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)“शरीर को प्रस्तुत किया जाए”अवैध रूप से हिरासत में लिए गए व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर रिहा करवाने के लिए (सरकारी व निजी दोनों के खिलाफ)।
2. परमादेश (Mandamus)“हम आदेश देते हैं”किसी सार्वजनिक अधिकारी को उसका कानूनी कर्तव्य निभाने का आदेश देने के लिए (निजी व्यक्ति या राष्ट्रपति के खिलाफ नहीं)।
3. प्रतिषेध (Prohibition)“रोकना / मना करना”ऊपरी अदालत द्वारा निचली अदालत को अपने अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) से बाहर काम करने से रोकने के लिए।
4. उत्प्रेषण (Certiorari)“पूर्णतः सूचित होना”निचली अदालत के किसी लंबित मामले या आदेश को ऊपरी अदालत में स्थानांतरित करने या रद्द करने के लिए।
5. अधिकार पृच्छा (Quo-Warranto)“आपका प्राधिकार क्या है?”किसी व्यक्ति द्वारा किसी सार्वजनिक पद को अवैध रूप से हथियाने से रोकने के लिए।
  • अनुच्छेद 33: संसद को यह शक्ति देता है कि वह सशस्त्र बलों (Armed Forces), पुलिस बलों और गुप्तचर संस्थाओं के सदस्यों के मौलिक अधिकारों को सीमित या संशोधित कर सके।
  • अनुच्छेद 34: जब किसी क्षेत्र में सेना विधि (Martial Law) लागू हो, तब मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध।
  • अनुच्छेद 35: मौलिक अधिकारों को प्रभावी बनाने के लिए कानून बनाने की शक्ति केवल संसद को प्राप्त है, राज्य विधानमंडलों को नहीं।

Constitution of India (भारतीय संविधान) Notes in Hindi | Features, History, Important Facts

  • जब राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency – Article 352) लागू होता है, तब मौलिक अधिकारों को निलंबित किया जा सकता है:
    1. अनुच्छेद 358: युद्ध या बाह्य आक्रमण के आधार पर आपातकाल घोषित होने पर अनुच्छेद 19 स्वतः (Automatically) निलंबित हो जाता है।
    2. अनुच्छेद 359: राष्ट्रपति आदेश जारी करके अन्य मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन को निलंबित कर सकते हैं।
    3. 44वां संविधान संशोधन (1978): इसके अनुसार, अनुच्छेद 20 और 21 को आपातकाल के दौरान भी किसी भी स्थिति में निलंबित नहीं किया जा सकता।
मामला (Case Law)वर्षऐतिहासिक निर्णय / प्रभाव (Key Judgment)
गोपालन मामला (A.K. Gopalan Case)1950SC ने अनुच्छेद 21 की संकीर्ण (Narrow) व्याख्या की और ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ को स्वीकार किया।
गोलकनाथ मामला (Golaknath Case)1967SC ने निर्णय दिया कि संसद मौलिक अधिकारों में कोई कटौती या संशोधन नहीं कर सकती।
केशवानंद भारती मामला (Kesavananda Bharati)1973SC ने ‘मूल ढांचे का सिद्धांत’ (Basic Structure Doctrine) दिया। संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान के मूल ढांचे को नष्ट नहीं कर सकती।
मेनका गांधी मामला (Maneka Gandhi Case)1978SC ने अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या की और अमेरिकी अवधारणा ‘विधि की सम्यक प्रक्रिया’ (Due Process of Law) को अपनाया।
पुट्टस्वामी मामला (K.S. Puttaswamy Case)2017SC की 9 जजों की पीठ ने निजता के अधिकार (Right to Privacy) को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया।
  1. रिट क्षेत्राधिकार: Supreme Court (Art 32) vs High Court (Art 226)
    • Supreme Court केवल मौलिक अधिकारों (FRs) के लिए रिट जारी कर सकता है।
    • High Court मौलिक अधिकारों के साथ-साथ अन्य कानूनी/सामान्य अधिकारों के लिए भी रिट जारी कर सकता है। इसलिए रिट के मामले में High Court का दायरा SC से बड़ा है।
  2. विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया vs विधि की सम्यक प्रक्रिया (“Procedure Established by Law” vs “Due Process of Law”)
    • Procedure Established by Law (ब्रिटिश): यह केवल प्रक्रिया की जांच करता है।
    • Due Process of Law (अमेरिका): यह प्रक्रिया के साथ-साथ कानून के न्यायसंगत (Fair & Just) होने की भी जांच करता है। (मेनका गांधी केस 1978 के बाद भारत में दोनों का व्यावहारिक प्रयोग होता है)।
  3. सशस्त्र बल और मार्शल लॉ (Armed Forces & Martial Law Detail) (अनुच्छेद 33 एवं 34)
    • संसद को सेना, पुलिस और गुप्तचर संस्थाओं (IB, RAW) के मौलिक अधिकारों को सीमित करने का अधिकार है।
    • ‘मार्शल लॉ’ (सैन्य शासन) शब्द को संविधान में कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है।
  4. Right to Property Removal Nuance (अनुच्छेद 19(1)(f) & 31)
    • Missing Micro-Point: 44वें संशोधन 1978 द्वारा इसे हटाने के बाद, संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं रहा। इसका मतलब है कि इसके उल्लंघन पर नागरिक सीधे SC (Art 32) नहीं जा सकता, बल्कि साधारण अदालतों या High Court (Art 226) के जरिए ही कानूनी राहत पा सकता है।
  • मौलिक अधिकारों का स्रोत: संयुक्त राज्य अमेरिका (US Bill of Rights)।
  • संविधान का मैग्ना कार्टा: भाग III
  • केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त अधिकार: अनुच्छेद 15, 16, 19, 29, और 30
  • विदेशियों और भारतीयों दोनों को प्राप्त अधिकार: अनुच्छेद 14, 20, 21, 21A, 22, 23, 24, 25, 26, 27, और 28
  • संविधान की आत्मा (अंबेडकर के अनुसार): अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार)।
  • आपातकाल में निलंबित न होने वाले अनुच्छेद: अनुच्छेद 20 और 21
  • अस्पृश्यता का अंत: अनुच्छेद 17
  • शिक्षा का अधिकार सम्बंधित संशोधन: 86वां संविधान संशोधन (2002) – अनुच्छेद 21A

Q1. निम्नलिखित में से कौन सा अनुच्छेद आपातकाल के दौरान भी निलंबित नहीं किया जा सकता है? (UPSC CSE / State PSC)

  • (A) अनुच्छेद 14 और 15
  • (B) अनुच्छेद 19 और 20
  • (C) अनुच्छेद 20 और 21
  • (D) अनुच्छेद 21 और 22

उत्तर: (C)

व्याख्या: 44वें संविधान संशोधन 1978 के अनुसार, अनुच्छेद 20 (अपराधों के लिए दोषसिद्धि से संरक्षण) और अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता) को राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी निलंबित नहीं किया जा सकता।

Q2. भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद के तहत ‘निजता का अधिकार’ (Right to Privacy) एक मौलिक अधिकार है? (UPSC / SSC CGL)

  • (A) अनुच्छेद 15
  • (B) अनुच्छेद 19
  • (C) अनुच्छेद 21
  • (D) अनुच्छेद 29

उत्तर: (C)

व्याख्या: 2017 के के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार को अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग घोषित किया।

Q3. “संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32) स्वयं में कोई अधिकार न होकर अन्य सभी मौलिक अधिकारों का रक्षक है।” समीक्षा कीजिए।

उत्तर की रूपरेखा (Model Outline):

  • भूमिका: अनुच्छेद 32 का परिचय दें और अंबेडकर के कथन (“हृदय और आत्मा”) का उल्लेख करें।
  • मुख्य भाग:
    1. बिना प्रवर्तन (Enforcement) के अधिकारों का निरर्थक होना समझाएं।
    2. 5 प्रकार की रिटों (Habeas Corpus, Mandamus आदि) की भूमिका स्पष्ट करें।
    3. SC और HC की रिट क्षेत्राधिकारिता की तुलना करें।
  • निष्कर्ष: कैसे अनुच्छेद 32 भारत में न्यायसंगत और जीवंत लोकतंत्र की गारंटी देता है।

Q1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. यह केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त है, विदेशियों को नहीं।
  2. इसे राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान केवल युद्ध या बाह्य आक्रमण के आधार पर ही निलंबित किया जा सकता है, सशस्त्र विद्रोह के आधार पर नहीं।
  • (A) केवल 1
  • (B) केवल 2
  • (C) 1 और 2 दोनों
  • (D) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (C)

व्याख्या: अनुच्छेद 19 केवल नागरिकों को उपलब्ध है (कथन 1 सही)। 44वें संशोधन के बाद, अनुच्छेद 358 के तहत अनुच्छेद 19 केवल ‘युद्ध या बाह्य आक्रमण’ पर निलंबित होता है, ‘सशस्त्र विद्रोह’ पर नहीं (कथन 2 सही)।

Q2. निम्नलिखित में से कौन सी रिट केवल किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ जारी की जा सकती है?

  • (A) बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)
  • (B) परमादेश (Mandamus)
  • (C) अधिकार पृच्छा (Quo-Warranto)
  • (D) (B) और (C) दोनों

उत्तर: (D)

व्याख्या: परमादेश और अधिकार पृच्छा दोनों केवल सार्वजनिक अधिकारियों / सार्वजनिक पदों के विरुद्ध जारी की जाती हैं, निजी व्यक्तियों के खिलाफ नहीं।

Q1: क्या मौलिक अधिकारों में संशोधन किया जा सकता है?

उत्तर: हाँ, संसद अनुच्छेद 368 के तहत मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है। लेकिन केशवानंद भारती केस (1973) के अनुसार, संसद ऐसा कोई संशोधन नहीं कर सकती जो संविधान के ‘मूल ढांचे’ (Basic Structure) को हानि पहुंचाता हो।

Q2: मौलिक अधिकार और मानवाधिकार (Human Rights) में क्या अंतर है?

उत्तर: मानवाधिकार वे अधिकार हैं जो प्रत्येक व्यक्ति को मनुष्य होने के नाते जन्म से मिलते हैं (जैसे जीवित रहने का अधिकार)। मौलिक अधिकार वे मानवाधिकार हैं जिन्हें किसी देश के संविधान द्वारा विशेष संरक्षण और कानूनी मान्यता दी जाती है।

Fundamental Rights

Constitution of India (भारतीय संविधान) Notes in Hindi | Features, History, Important Facts

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