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राजस्थान में मिट्टी के प्रकार – राजस्थान मृदा वर्गीकरण

राजस्थान मृदा वर्गीकरण: राजस्थान में मिट्टी का वर्गीकरण दो प्रकार से किया जाता है-

  1. सामान्य आधार पर मिट्टी का वर्गीकरण
  2. मिट्टी का वैज्ञानिक वर्गीकरण
राजस्थान में मिट्टी के प्रकार – राजस्थान मृदा वर्गीकरण

सामान्य आधार पर राजस्थान में मिट्टी का वर्गीकरण

राजस्थान में सामान्य आधार पर मृदा को 12 भागों में बाँटा गया है-

1. रेतीली/ बलुई (एरीडीसोल्स) मृदा

  • यह मृदा Arid (शुष्क) है।
  • यह मृदा सम्पूर्ण शुष्क क्षेत्र में पाई जाती है। (0-25 cm वर्षा वाले क्षेत्र में)
  • यह मृदा पश्चिमी शुष्क मरुस्थल (जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर, तथा जोधपुर) में पाई जाती है
  • इस मृदा में फास्फोरस व कैल्शियम की प्रचुरता पाई जाती है। अत: यह मृदा उपजाऊ तो है लेकिन सबसे मोटे कणों वाली होने के कारण इस मृदा में जल धारण की क्षमता अपेक्षाकृत कम समय तक होती है। इस कारण रेतीली मृदा में मोटे अनाज की फसलें बोई जाती हैं।
  • इसी कारण राज्य में बाजरे का सर्वाधिक बोया गया क्षेत्र बाड़मेर है।

2. भूरी रेतीली मृदा (एन्टीसोल्स)

  • सम्पूर्ण अर्द्धशुष्क क्षेत्र व बनास के मैदान में पाई जाने वाली यह मृदा अरावली के दोनो ओर फैली है।
  • यह मृदा राजस्थान में सर्वाधिक भाग पर फैली है।
  • रेतीली मृदा का निर्माण बलुआ क्रम की च‌ट्टानों के अपरदन से शुष्क क्षेत्र में हुआ है।
  • इसके कण रेतीली मृदा से थोड़े बारीक होते हैं।
  • इस मृदा में कैल्शियम व फॉस्फेट की अधिकता होती है तथा नाइट्रोजन व पोटाश की कमी होती है।
  • यह मृदा दलहन फसलों के लिये उपयोगी होती है। इसी कारण राज्य में सर्वाधिक दालें- नागौर, बीकानेर में होती हैं।
  • मूंग सर्वाधिक नागौर तथा मोठ सर्वाधिक बीकानेर, चूरू में होती है।
  • बीकानेरी भुजिया मोठ की दाल की बनी होती है।

3. भूरी रेतीली कच्छारी मृदा

  • घग्घर के मैदान व आंशिक रूप से अलवर में पाई जाती है।

4. लाल मृदा / लाल लोमी मृदा / लाल दोमट मृदा

  • प्राप्ति क्षेत्र – डूंगरपुर, उदयपुर, राजसमंद
  • यह मृदा मध्यम वर्षा वाले क्षेत्रों में ग्रेनाइट चट्टानों के अपरदन से बनी है।
  • इस मृदा में लौह ऑक्साइड (Iron Oxide) की अधिकता होती है। इस कारण इस मृदा का रंग लाल होता है।
  • यह मृदा मक्का की खेती के लिये उपयोगी होती है इसी कारण राज्य मे मक्का उत्पादन में अग्रणी जिले क्रमशः भीलवाड़ा, उदयपुर, चिलौड़गढ़ हैं।

5. लाल – काली मृदा

  • प्राप्ति क्षेत्र – बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, चिलौड़गढ़, भीलवाड़ा
  • इस मृदा में लाल व काली मृदा के संयुक्त गुण पाये जाते हैं। अत: इस मृदा में मक्का व अफीम संयुक्त रूप से बोये जाते है।
  • इसी कारण अफीम उत्पादन में प्रथम स्थान- चितौडगढ़

6. काली / मध्यम काली मृदो (वर्टी सोल्स मृदा)

  • प्राप्ति क्षेत्र – हाडौती का पठार
  • यह मृदा उच्च वर्षा व उच्च आर्द्रता वाले क्षेत्रों में बेसाल्टिक चट्टानो के अपरदन से बनी है।
  • सबसे बारीक कणों वाली मृदा है। (चिका/ क्ले/ मृतिका की अधिकता)
  • भारत की सबसे आर्द्रतम / नमीयुक्त मृदा है।
  • इस मृदा में कम सिचाई व कम जुताई की की आवश्यकता होती है।
  • यह मृदा सूखने के बाद दरारों में बदल जाती है (स्वजोत वाली मृदा है )
  • इस मृदा में लौहा / फेरस, चूना व एल्यूमिना की अधिकता होती है।
  • इसमें नाइट्रोजन व पोटाश की कमी होती है।
  • सर्वाधिक कपास के लिए उपयोगी है। अत: इसे कपासी / रेगुड़ (रेगर) मृदा कहते हैं।

7. लाल-पीली मृदा

विस्तार – सवाई माधोपुर, करौली व आंशिक रूप से सिरोही में पाई जाती है।

8. जलोढ़ / काँप / कच्छारी / दोमट / एल्युबिल (अल्फीसोल्स)

  • विस्तार – पूर्वी राजस्थान में नदियों के मार्ग में पाई जाती है।
  • यह मृदा भारत में सर्वाधिक क्षेत्र पर विस्तृत है। ( 40-43% भाग)
  • यह भारत की सबसे उपजाऊ मृदा है, क्योंकि इस मृदा में पोटाश व नाइड्रोजन की अधिकता होती है।
  • सभी प्रकार की फसलों के लिये उपयोगी होती है।
  • इस मृदा का हर वर्ष नवीनीकरण होता है।
  • खादर– नवीनतम जलोढ़ मृदा को कहते हैं।
  • बांगर – पुरातन जलोढ़ मृदा को कहते हैं।

9. भूरी मृदा

  • यह मृदा बनास के मैदान में पाई जाती है।

10. पर्वतीय मृदा

  • यह मृदा अरावली पर्वतीय क्षेत्र में पाई जाती है।

11. लोयस मृदा

  • यह मृदा सवाई माधोपुर व झुंझुनू में पाई जाती है।

12. सिरोजम / धूसर मृदा

  • यह मृदा नागौर, पाली, अजमेर में पाई जाती है।

राजस्थान की मिट्टियों का अन्तर्राष्ट्रीय (International) वर्गीकरण

राजस्थान में अन्तर्राष्ट्रीय आधार पर मृदा को 5 भागों में बाँटा गया है-

1. एरीडीसोल्स / बलुई / रेतीली

  • यह मृदा Arid (शुष्क) होती है।
  • यह सबसे मोटे कण वाली मृदा होती है।
  • इसमें जल धारण की क्षमता अपेक्षाकृत कम समय तक होती है।
  • यह मृदा मोटे अनाजो व मरुदभिद वनस्पति के लिए उपयोगी होती है।
  • इसमें केल्शियम व फास्फोरस की प्रचुरता होती है।

2. एन्टी सोल्स (पीली- भूरी मृदा)

  • यह मृदा सम्पूर्ण पश्चिमी राजस्थान में एरीडीसोल्स मृदा के साथ- साथ भी पाई जाती है।
  • इस सवर्ग की मृदायें राजस्थान में सर्वाधिक क्षेत्रफल विस्तृत हैं।

3. इंसेप्टीसोल्स (आर्द्रतम)

  • इस सवर्ग की मृदायें भारत में सर्वाधिक भाग पर पाई जाती हैं।
  • इस सवर्ग की मृदायें राज्य में न्यूनतम भाग पर फैली हैं।

4. वर्टी सोल्स (काली मृदा)

  • विस्तार – हाडौती क्षेत्र में
  • सबसे बारीक कणों वाली मृदा (चिका / क्ले/ मृतिका की अधिकता)
  • सबसे आर्द्रतम / नमीयुक्त मृदा
  • लोहांश / फेरस, चूना, एल्यूमिना की प्रचुरता
  • बेसाल्टिक चट्टानो के अपरदन से बनी है।
  • कपास की खेती के लिए सर्वाधिक उपयोगी है।

5. अल्फीसोल्स (जलोढ़)

  • यह मृदा पूर्वी राजस्थान में नदियों के मार्ग में पाई जाती है।
  • विस्तार- जयपुर, दौसा, टोंक, सवाईमाधोपुर, धौलपुर आंशिक अलवर
  • इस मृदा का हर साल नवीनीकरण होता है।
  • खादर – नवीनतम जलोढ़ मृदा को खादर कहते हैं
  • बांगर– पुरातन जलोढ़ मृदा को बांगर कहते हैं
  • यह सबसे उपजाऊ मृदा है। अत: सभी फसलों के लिये उपयोगी है।

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राजस्थान में मृदा की समस्याएं

FAQ

राजस्थान में कितने प्रकार की मिट्टियाँ पाई जाती हैं?

राजस्थान में मुख्यतः 12 प्रकार की मिट्टियाँ पाई जाती हैं।

राजस्थान में सबसे अधिक क्षेत्र में कौन-सी मिट्टी पाई जाती है?

राजस्थान में सबसे अधिक क्षेत्र मरुस्थलीय (रेतीली) मिट्टी से आच्छादित है।

जलोढ़ मिट्टी राजस्थान के किन क्षेत्रों में मिलती है?

जलोढ़ मिट्टी मुख्य रूप से गंगा और उसके सहायक नदियों के मैदानी भागों में मिलती है, विशेषकर भरतपुर, धौलपुर और कोटा क्षेत्रों में।

राजस्थान की कौन-सी मिट्टी कृषि के लिए सबसे उपयुक्त है?

जलोढ़ और काली मिट्टी राजस्थान में कृषि के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती हैं।

मरुस्थलीय मिट्टी की प्रमुख विशेषता क्या है?

मरुस्थलीय मिट्टी हल्की, कम उपजाऊ और पानी सोखने की क्षमता कम होने के कारण कृषि के लिए कम उपयुक्त होती है।


राजस्थान में मृदा का वर्गीकरण क्या है?

राजस्थान में मिट्टी का वर्गीकरण दो प्रकार से किया जाता है-
सामान्य आधार पर मिट्टी का वर्गीकरण
मिट्टी का वैज्ञानिक वर्गीकरण

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