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राजस्थान के चौहान वंश का संपूर्ण इतिहास (Rajasthan Ka Chauhan Vansh)

राजस्थान का इतिहास अदम्य साहस और बलिदान की गाथाओं से भरा है, जिसमें चौहान वंश (Chauhan Dynasty) का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। सांभर की झीलों से लेकर दिल्ली के तख्त तक और रणथम्बौर के बीहड़ों से लेकर जालौर के किलों तक, चौहानों ने अपनी वीरता की अमिट छाप छोड़ी है।

भाग 1: चौहानों की उत्पत्ति और प्रारंभिक इतिहास (Chauhan Dynasty History)

1. चौहानों की उत्पत्ति के विभिन्न सिद्धान्त

इतिहासकारों ने चौहानों की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं:

A. अग्निकुण्ड सिद्धान्त (Agnikunda Theory):

महाकवि चन्द्रवरदायी की प्रसिद्ध पुस्तक “पृथ्वीराज रासौ” के अनुसार, आबू पर्वत पर ऋषि वशिष्ठ द्वारा किए गए यज्ञ के अग्निकुण्ड से चार राजपूत जातियों की उत्पत्ति हुई:

  1. प्रतिहार
  2. परमार
  3. चालुक्य (सोलंकी)
  4. चौहान (चाहमान)

समर्थक: मुहणौत नैणसी और सूर्यमल्ल मीसण ने इस सिद्धांत का समर्थन किया है.

B. सूर्यवंशी सिद्धान्त (Suryavanshi Theory):

कई स्रोत चौहानों को सूर्यवंशी मानते हैं:

  • पृथ्वीराज विजय (जयानक कृत)
  • हम्मीर महाकाव्य (नयनचन्द्र सूरि कृत)
  • हम्मीर रासौ (सारंगधर/जोधराज कृत)
  • विग्रहराज चतुर्थ का अजमेर अभिलेख
  • पृथ्वीराज II का हाँसी (हरियाणा) अभिलेख (1167 ई.)
  • अचलेश्वर मंदिर अभिलेख
C. चन्द्रवंशी सिद्धान्त (Chandravanshi Theory):

कुछ गिने-चुने मत इन्हें चंद्रवंशी भी मानते हैं।

D. ब्राह्मण सिद्धान्त (Brahman Theory):

यह सिद्धान्त अत्यंत महत्वपूर्ण है और प्रामाणिक अभिलेखों पर आधारित है:

  • बिजौलिया अभिलेख (1170 .): इसमें चौहानों को वत्सगौत्रीय ब्राह्मण’ कहा गया है।
  • चन्द्रावती (सिरोही) अभिलेख
  • कायम रासौ (नियामत खाँ ‘जान’ कृत)
  • समर्थक: डॉ. दशरथ शर्मा (प्रसिद्ध इतिहासकार).
E. विदेशी सिद्धान्त (Foreign Theory):

विदेशी इतिहासकारों ने इन्हें विदेशी जातियों से जोड़ा है:

  • कर्नल जेम्स टॉड: इन्होंने चौहानों को शक और सीथियन (Scythians) की संतान बताया है।
  • समर्थक: विलियम क्रुक और विलियम स्मिथ.
F. इन्द्र के वंशज:

रायपाल के सेवाड़ी (पाली) अभिलेख में चौहानों को इन्द्र का वंशज बताया गया है.

2. बिजौलिया अभिलेख (1170 ईस्वी): इतिहास का स्वर्ण-विहंगम

यह अभिलेख चौहान इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए सबसे प्रामाणिक स्रोतों में से एक है।

  • प्राप्ति स्थल: पार्श्वनाथ मंदिर, बिजौलिया (भीलवाड़ा).
  • रचनाकार: गुणभद्र.
  • लेखक: केशव।
  • उत्कीर्णक: गोविन्द.
  • स्थापना: इसे लोलाक जैन द्वारा मंदिर में लगवाया गया था.
  • समकालीन शासक: यह अजमेर के शासक सोमेश्वर चौहान के समय का है, जिन्हें इसमें ‘प्रताप लंकेश्वर’ की उपाधि दी गई है.
  • ऐतिहासिक तथ्य:
    • यह चौहानों को वत्सगौत्रीय ब्राह्मण प्रमाणित करता है.
    • इसमें सांभर झील का निर्माता वासुदेव चौहान को बताया गया है.
    • यह विग्रहराज चतुर्थ को दिल्ली का विजेता घोषित करता है.
  • राजस्थान के नगरों के प्राचीन नाम: इस अभिलेख से हमें राजस्थान के कई शहरों के प्राचीन नाम पता चलते हैं:
    • बिजौलिया – विजयावल्ली
    • उपरमाल – उत्तमाद्रि
    • नागौर – अहिच्छत्रपुर
    • जालौर – जाबालिपुर
    • भीनमाल – श्रीमाल
    • सांभर – शाकम्भरी
    • नागदा – नागहृद
    • दिल्ली – दिल्लिका

भाग 2: शाकम्भरी (सांभर) के प्रारंभिक चौहान शासक

1. वासुदेव चौहान (551 ई.)

  • मूल स्थान: सपादलक्ष (सांभर).
  • प्रारंभिक राजधानी: अहिच्छत्रपुर (नागौर).
  • स्थापना: राजशेखर की पुस्तक प्रबंध कोष के अनुसार, वासुदेव चौहान ने 551 . में चौहान वंश की नींव डाली।

2. गुवक-I

  • प्रारंभिक स्थिति: यह प्रारंभ में प्रतिहार राजा नागभट्ट II का सामन्त था.
  • उपाधि: नागभट्ट II ने इसे वीर’ की उपाधि दी थी.
  • महत्व: गुवक-I चौहानों का प्रथम स्वतंत्र राजा बना, जिसने प्रतिहारों की अधीनता त्याग दी.

3. चन्द्रराज चौहान (और रानी रुद्राणी)

  • विशिष्ट तथ्य: चन्द्रराज की रानी आत्मप्रभा (रुद्राणी) यौगिक क्रियाओं में निपुण थी. वह पुष्कर झील में प्रतिदिन 1000 दीपक जलाकर भगवान शिव की पूजा करती थी.

4. वाकपतिराज चौहान

  • उपलब्धि: इसे 108 युद्धों का विजेता कहा जाता है.
  • शाखा की स्थापना: इसके पुत्र लक्ष्मणराज चौहान ने 960 ई. में नाडौल (पाली) में चौहान वंश की एक अलग शाखा स्थापित की.

5. विग्रहराज II

  • विजय: इसने गुजरात के चालुक्य राजा मूलराज-I को युद्ध में पराजित किया.
  • निर्माण: भड़ौंच (गुजरात) में अपनी कुलदेवी आशापुरा माता के मंदिर का निर्माण करवाया.

6. गोविन्द III (वेरीघट्ट)

  • उपाधि: ‘पृथ्वीराज विजय’ में इसे वेरीघट्ट (शत्रु संघारक) कहा गया है.
  • महत्व: फरिश्ता के अनुसार, गोविन्द-III ने गजनी के आक्रमणकारियों को मारवाड़ में आगे बढ़ने से रोका था.

भाग 3: अजमेर के चौहान शासक – स्वर्णकाल

जब चौहानों ने अपनी राजधानी सांभर से अजमेर स्थानांतरित की, तब उनका उत्कर्ष अपने चरम पर पहुँचा।

1. अजयराज (1105-1133 ई.)

  • नगर स्थापना: अजयराज ने 1113 . में अजयमेरु (अजमेर) नगर बसाया.
  • दुर्ग निर्माण: बीठली पहाड़ी पर गढ़ बीठली’ (अजमेरु दुर्ग) बनवाया.
  • मुद्रा पद्धति: इसने अपने और अपनी रानी सोमलेखा (सोमलदेवी) के नाम के चाँदी एवं ताँबे के सिक्के चलवाए, जिन्हें अजयप्रियद्रम्म कहा जाता है.
  • अंतिम समय: अपना शासन अपने पुत्र अर्णोराज को सौंपकर अंतिम समय पुष्कर में बिताया.

2. अर्णोराज (आनाजी) (1133-1153 ई.)

  • आनासागर झील: 1135 ई. में तुर्की सेना को पराजित करने के बाद, युद्धस्थल को साफ करने के लिए चन्द्रा नदी के जल को रोककर आनासागर झील का निर्माण करवाया.
    • शाहीबाग: झील के पास जहाँगीर ने शाहीबाग (दौलतबाग) बनवाया, जिसे अब सुभाष उद्यान कहते हैं। यहीं नूरजहाँ की माँ अस्मत बेगम ने गुलाब के इत्र’ का आविष्कार किया था.
    • बारहदरी: शाहजहाँ ने झील के किनारे 5 बारहदरियों का निर्माण करवाया.
  • वैवाहिक संबंध:
    • गुजरात के चालुक्य राजा जयसिंह सिद्धराज को हराकर उसकी पुत्री कांचनदेवी से विवाह किया.
    • गुजरात के ही राजा कुमारपाल से हारने के बाद अपनी पुत्री जाल्हण देवी का विवाह कुमारपाल से किया.
  • निर्माण: पुष्कर में वराह मंदिर बनवाया.
  • दरबारी विद्वान: देवबोध और धर्मघोष.
  • पितृहन्ता: अर्णोराज की हत्या उसके पुत्र जग्गदेव ने की, जिसे चौहान वंश का पितृहन्ता कहा जाता है.

3. विग्रहराज IV (बीसलदेव) (1153-1163 ई.)

  • स्वर्णकाल: डॉ. दशरथ शर्मा ने इनके शासनकाल को अजमेर का स्वर्णकाल कहा है.
  • दिल्ली विजय: ढिल्लिका (दिल्ली) के तोमर शासकों को हराकर दिल्ली को चौहान साम्राज्य में मिलाया.
  • शिवालिक स्तंभलेख: दिल्ली में शिवालिक स्तंभलेख उत्कीर्ण करवाया (अशोक के टोपरा अभिलेख के नीचे)। इसके अनुसार, इसने मलेच्छों (मुस्लिमों) को अटक नदी (पाकिस्तान) के पार खदेड़ दिया था.
  • साहित्य और कला:
    • अजमेर में धार (M.P.) की तर्ज पर सरस्वती कण्ठाभरण’ संस्कृत पाठशाला बनवाई. इसकी दीवारों पर स्वयं द्वारा रचित हरकेली’ नाटक की पंक्तियाँ उत्कीर्ण थीं.
    • कुतुबुद्दीन ऐबक ने इस पाठशाला को तुड़वाकर अढ़ाई दिन का झोंपड़ा’ (16 खम्भा मस्जिद) बनवा दिया.
    • हरकेली नाटक भारवि के ‘किरातार्जुनियम’ पर आधारित है.
  • दरबारी विद्वान:
    • सोमदेव: “ललित विग्रहराज” (विग्रहराज और देसलदेवी की प्रेम कहानी).
    • नरपति नाल्ह: “बीसलदेव रासौ” (बीसलदेव और राजमति की कहानी).
  • उपाधियाँ: बीसलदेव, कवि बन्धु (कवियों का आश्रयदाता होने के कारण).

4. पृथ्वीराज II

  • हाँसी अभिलेख (1167): इसमें चौहानों को चन्द्रवंशी कहा गया है.
  • धौड़ अभिलेख (1169): रूठी रानी के मंदिर से प्राप्त. इसके अनुसार, पृथ्वीराज II ने अपने बाहुबल से अजमेर का राज्य प्राप्त किया था.
  • निर्माण: अपनी रानी सुहाव देवी के नाम पर मेनाल (भीलवाड़ा) में सुहवेश्वर शिव मंदिर बनवाया.

5. सोमेश्वर चौहान

  • प्रारंभिक जीवन: बचपन ननिहाल (गुजरात) में बीता. गुजरात के राजा कुमारपाल के शत्रु कोंकण के राजा मल्लिकार्जुन को युद्ध में मारा.
  • विवाह: चेदि (M.P.) के कलचुरि वंश के शासक अचलराज की पुत्री कर्पूरी देवी से विवाह किया.
  • निर्माण: अजमेर में वैद्यनाथ मंदिर बनवाया और उसमें अपनी व अपने पिता अर्णोराज की मूर्तियाँ लगवाईं.

भाग 4: पृथ्वीराज चौहान-III (1177-1192 ई.) – अंतिम हिन्दू सम्राट

पृथ्वीराज III चौहान वंश के सबसे प्रसिद्ध और अंतिम प्रतापी शासक थे.

  • परिचय: पिता-सोमेश्वर, माता-कर्पूरी देवी
  • संरक्षिका: अल्पायु होने के कारण माता कर्पूरी देवी ने प्रमुख मंत्रियों (भुवनमल्ल, कैमास) के सहयोग से एक वर्ष तक शासन संभाला.
  • उपाधियाँ: सपादलक्षेश्वर, राय पिथौरा, दल पुंगल (विश्व विजेता), अंतिम हिन्दू सम्राट.
  • संघर्ष और विजय:
    • घरेलू विद्रोह: 1181 में गुरुग्राम में अपने चचेरे भाइयों नागार्जुन और अपरगांग्य के विद्रोह को दबाया.
    • भण्डानक जाति: 1182 में सतलज प्रदेश से आने वाली विद्रोही जाति भाण्डानकों का दमन किया.
    • महोबा/तुमुल का युद्ध (1182): चन्देल राजा परमार्दिदेव को पराजित किया. महोबा के वीर सेनापति आल्हा व ऊदल लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए. जीत के बाद महोबा का प्रशासक पंजुनराय को बनाया.
    • गुजरात संघर्ष: गुजरात के भीमदेव-II से नागौर का युद्ध (1184) लड़ा. कारण आबू की राजकुमारी इच्छनी देवी से विवाह था. अंततः जगदेव प्रतिहार ने समझौता करवाया.
    • कन्नौज विवाद (गहड़वाल): कन्नौज के राजा जयचंद गहड़वाल से विवाद के कारण दिल्ली का उत्तराधिकार और संयोगिता का अपहरण (प्रेम कहानी) थे. दशरथ शर्मा ने इस प्रेम कहानी को ऐतिहासिक माना है.
  • मोहम्मद गौरी से संघर्ष (तराइन के युद्ध):
    • तराइन का प्रथम युद्ध (1191 .): गौरी द्वारा तबर-ए-हिन्द (भटिंडा) पर अधिकार करने के कारण हुआ. पृथ्वीराज III ने मोहम्मद गौरी को बुरी तरह पराजित किया.
    • तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 .): इस युद्ध में पृथ्वीराज III की हार हुई. उन्हें सिरसा के सरस्वती नामक स्थान से बंदी बना लिया गया.
    • नोट: हसन निजामी की पुस्तक “ताज-उल-मासिर” के अनुसार, पृथ्वीराज ने कुछ समय तक गौरी के अधीन अजमेर पर शासन किया था.
  • दरबारी विद्वान:
    • चन्द्रवरदायी (मूल नाम- पृथ्वीभट्ट): “पृथ्वीराज रासौ” (इसे उनके पुत्र जल्हण ने पूर्ण किया).
    • जयानक: “पृथ्वीराज विजय”
    • विद्यापति गौड़, विश्वरूप, आशाधर, वागीश्वर जनार्दन.
  • सांस्कृतिक कार्य: कला एवं संस्कृति विभाग की स्थापना की और मंत्री पद्मनाभ को नियुक्त किया.

भाग 5: रणथम्बौर के चौहान

तराइन के युद्ध के बाद चौहानों की एक शाखा रणथम्बौर में स्थापित हुई.

  • स्थापना: गोविन्दराज (पृथ्वीराज III के पुत्र) ने 1194 . में नींव डाली.
  • प्रारंभिक शासक:
    • वीरनारायण: इल्तुतमिश का असफल आक्रमण. वीरनारायण संघर्ष में वीरगति को प्राप्त.
    • वागभट्ट: नासिरुद्दीन महमूद का असफल आक्रमण.
    • जैतसिंह: रणथम्बौर पर 32 वर्षों तक शासन किया.

हम्मीरदेव चौहान (1282-1301 ई.)

यह रणथम्बौर के सबसे प्रतापी और हठी शासक थे.

  • परिचय: पिता-जैतसिंह, माता-हीरादेवी, रानी-रंगदेवी, पुत्री-देवलदे.
  • दरबारी: गुरु-राघवदेव, विद्वान-बीजादित्य.
  • साहित्य: स्वयं श्रृंगार हार पुस्तक लिखी.
  • विजयी अभियान: 17 में से 16 युद्धों के विजेता. मेवाड़ के समर सिंह, आबू के प्रतापसिंह और धार के भोज को हराया. कोटियज्ञ (कोटियंजन) यज्ञ करवाया.
  • सेनापति: गुरुदास सैनी (झाइन दुर्ग की रक्षा में वीरगति), भीमसिंह (वीरगति), धर्मसिंह.

जलालुद्दीन खिलजी (J.K.) का आक्रमण (1290-1292 ई.)

  • J.K. ने 2 बार असफल आक्रमण किया.
  • दूसरे आक्रमण में उसने झाइन दुर्ग (रणथम्बौर की कुंजी) पर अधिकार किया, जहाँ हम्मीर का सेनापति गुरुदास सैनी मारा गया.
  • असफल होने पर जलालुद्दीन ने कहा: ऐसे 10 दुर्गों को मैं मुसलमान के इक बाल के बराबर भी नहीं समझता।
  • जानकारी का स्रोत: अमीर खुसरो की पुस्तक मिफ्ताहउलफुतूह.

अलाउद्दीन खिलजी (A.K.) का आक्रमण (1301 ई.)

  • कारण: हम्मीर द्वारा खिलजी के विद्रोही सेनापतियों (मुहम्मद शाह और केहब्रू) को शरण देना.
  • हम्मीर हठ (चन्द्रशेखर कृत): इसके अनुसार, बेगम चिमना और मोहम्मदशाह के प्रेम के कारण विद्रोह हुआ.
  • युद्ध: संघर्ष में खिलजी का सेनापति नुसरत खाँ मारा गया.
  • विश्वासघात: हम्मीर के सेनापति रतिपाल और रणमल के विश्वासघात के कारण खिलजी सेना दुर्ग में घुसी.
  • साका (11 जुलाई 1301):
    • हम्मीर ने केसरिया किया.
    • रानी रंगदेवी ने जौहर किया (फारसी भाषा में जौहर का पहला वर्णन ‘खजाइन-उल-फुतूह’ में मिलता है).
    • पुत्री देवलदे ने पदम तालाब में कूदकर जल जौहर किया.
  • परिणाम: अलाउद्दीन ने दुर्ग उलुग खाँ को सौंप दिया. अमीर खुसरो ने कहा: आज कुफ्र का गढ़ इस्लाम का घर हो गया।
  • हम्मीर से संबंधित साहित्य:
    • नयनचन्द्र सूरि – हम्मीर महाकाव्य
    • सारंगधर/जोधराज – हम्मीर रासो
    • चन्द्रशेखर – हम्मीर हठ
    • भांडऊ व्यास – हम्मीर रायण
    • राज्रूप – हम्मीर रा छन्द

भाग 6: जालौर के सोनगरा चौहान

जालौर की शाखा अपनी वीरता और स्वाभिमान के लिए जानी जाती है.

  • नाडौल के चौहान: वाक्पतिराज के पुत्र लक्ष्मण चौहान ने 960 ई. में स्वतंत्र राज्य स्थापित किया था.
  • जालौर स्थापना: नाडोल के राजा अल्हण के पुत्र कीर्तिपाल ने 1181 . में परमार राजा कुन्तपाल को हराकर नींव डाली.
  • नामकरण: जाल वृक्ष की अधिकता के कारण ‘जालौर’ और सोनगिरी (सुवर्णगिरी) पहाड़ी पर स्थित होने के कारण यहाँ के चौहान ‘सोनगरा’ कहलाए.
  • कीर्तिपाल: मुहणौत नैणसी ने इसे कीतू एक महान राजा’ कहा है. सुन्धा पर्वत लेख में इसे ‘राजशेखर’ कहा गया है.
  • उदयसिंह: इल्तुतमिश से नाडौल और मण्डौर छीन लिया.
  • चचिंगदेव: ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण की.
  • सामंत सिंह (1291 .): जलालुद्दीन खिलजी के आक्रमण को साचौर में ही रोक दिया.

कान्हड़देव सोनगरा (1294-1311 ई.)

  • परिचय: पुत्र-वीरमदेव, सेनापति-जैता देवड़ा.
  • साहित्य: पद्मनाभ की पुस्तकें कान्हड़देव प्रबन्ध और वीरमदेव सोनगरा री बात मुख्य स्रोत हैं.
  • अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के कारण: साम्राज्यवादी नीति, व्यापारिक मार्ग पर स्थिति और गुजरात अभियान से लौटती खिलजी सेना को रास्ता न देना.
  • विरोध: गुजरात विजय से लौटती खिलजी सेना से जैता देवड़ा ने सोमनाथ शिवलिंग के टुकड़े छीन लिए थे.
  • संधि (1305 .): फरिश्ता के अनुसार, ऐन-उल-मुल्क-मुल्तानी ने संधि करवाई और कान्हड़देव को दिल्ली ले गया.
  • कान्हड़देव प्रबन्ध: इसके अनुसार, कान्हड़देव के स्थान पर पुत्र वीरमदेव दिल्ली गया. आक्रमण का एक प्रमुख कारण वीरमदेव और खिलजी की पुत्री फिरोजा के मध्य प्रेम था.

सिवाणा का साका (1308 ई.)

  • जालौर जीतने से पहले खिलजी ने सिवाणा पर आक्रमण किया (सिवाणा को जालौर दुर्ग की कुंजी कहा जाता है).
  • सेनापति: कमालुद्दीन गुर्ग.
  • शासक: सातल और सोम.
  • विश्वासघात: भावले / भायल ने पेयजल स्रोत ‘भाण्डेलाव तालाब’ को अपवित्र कर दिया.
  • साका: सातल और सोम ने केसरिया किया, रानी मेणा दे ने जौहर किया.
  • परिणाम: अलाउद्दीन ने सिवाणा का नाम खैराबाद’ कर दिया.

जालौर का साका (1311 ई.)

  • तुर्की सेना ने सांचौर के महावीर मंदिर और भीनमाल को नष्ट किया.
  • विश्वासघात: बीका दहिया ने दुर्ग का गुप्त रास्ता बताया (उसकी पत्नी हीरा दे ने उसकी हत्या कर दी)।
  • साका: कान्हड़देव और वीरमदेव ने केसरिया किया, रानी जेतल दे ने जौहर किया.
  • परिणाम: अलाउद्दीन ने जालौर का नाम जलालाबाद’ कर दिया.

निष्कर्ष (Conclusion): चौहान वंश का इतिहास 551 ई. से लेकर 1311 ई. तक वीरता, कला, और सांस्कृतिक उत्थान का एक गौरवशाली अध्याय है. वासुदेव चौहान की दूरदर्शिता, अजयराज की नगर नियोजन, विग्रहराज की विद्वत्ता, पृथ्वीराज की अदम्य वीरता, हम्मीरदेव की हठ और कान्हड़देव का स्वाभिमान – यह सब मिलकर राजस्थान के इतिहास को जीवंत बनाते हैं. यह विस्तृत पोस्ट प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए एक संपूर्ण संदर्भ सामग्री है

 

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